भाजपा के गढ़ में सेंध लगना चुनौति

खबर - प्रशांत गौड़ 
कांग्रेस में बागी ज्यादा, खड़ी कर रहे है परेशानियां 
दिग्गजों की सीट पर ज्यादा खतरा 
जयपुर । कांग्रेस के लिए जयपुर में भाजपा के अभेध दुर्ग में सेंध लगना आसान नहीं  है। टिकट वितरण में मचे बवाल के बाद कांग्रेस की मजबूत पकड़ कुछ कमजोर हुई है। कांग्रेस में अधिकांश सीटों पर सामने आए बागी के कारण उस सीट पर कांग्रेस की हार की संभावना भी जताई जा रही है। इसमें दिग्गजों की सीट ही खतरे में है। जयपुर बीजेपी का गढ रहा है ऐसे में भाजपा के मजबूत प्रत्याशी ज्यादा है तो कांग्रेस ने केवल तीन दिग्गज पर भरोसा जताया है इसमें महेश जोशी, लालचंद कटारिया,  प्रतापसिंह खाचरियावास शामिल है जबकि भाजपा की पूरानी टीम ही उतरी है जो यहां से दो बार चुनाव जीत चुके है।
कांग्रेस की मालवीय नगर सीट, सिविल लाईंस सीट, हवामहल सीट, किशनपोल सीट, सांगानेर सीट, झोटवाड़ा सीट, विद्याधर नगर सीट में बागियों के कारण पेंच फंसा है। इन सीटों पर टिकटों को लेकर घोषित प्रत्याशियों के बाद पार्टी को बगावत और अन्दुरूनी विरोध झेलना पड़ रहा है।
अपनों से संकट
किशनपोल सीट पर ही यहां से अपनों से संकट है। कांग्रेस यहां पर नाराजगी दूर कर लेने की बात कह रही है लेकिन यहां पर अन्दुरूनी वोटबैंक में सेंध लगने की बात सामने आ रही है। इसका नुकसान कांग्रेस को हो सकता है। वही मोहनलाल की वैश्यमतदाताओं पर पकड़ होने के कारण और एक छत्र वोट इस समाज के उनको मिलने के कारण तीन बार से लगातार जीत रहे है इस बार चौथी बार मैदान में है।
डरा रहे एक समाज के बहुसंख्यक प्रत्याशी 
हवामहल सीट पर मुस्लिम समाज के सामने आए प्रत्याशी कांग्रेस की चिताएं बढ़ा रहे है। मुस्लिम वोटबैंक बिखरने से इसका नुकसान कांग्रेस हो सकता है वहीं भाजपा प्रत्याशी को भी यहां पर अपनो से खतरा है यही कारण है कि सुरेन्द्र पारीक टीम के साथ रहने की ज्यादा कोशिश करते है।
नया प्रत्याशी विवादों से घिरा
सांगानेर हॉट सीट मानी जाती है। यहां पर भाजना के कदावर नेता रहे और बागी होने के बाद अपनी पार्टी बनाकर चुनाव लड़ रहे घनश्याम तिवाडी के साथ सहानभूति मानी जा रही है वहीं कांग्रेस से उतरे पुष्पेन्द्र भारद्वाज पर अपराधिक मुकदमे होने और छवि सही नहीं होने का बवडंर उन पर भारी पड़ सकता है वहीं बीजेपी से मेयर अशोक लाहोटी है जिनका वोट मैजनमेंट फंडा बहुत अच्छा है लेकिन उनकी कार्यकर्ताओं और आम जनता से महापौर बनने के बाद रही दूरी उन पर भारी पड़ सकती है।
सिविल लाईंस में भीतरीघात की आशंका 
कांग्रेस के कद्दावर नेता प्रतापसिंह खाचरियावास यहां से उम्मीदवार है। यहां पर ब्राह्मण मतदाताओं को बाहुल्य होने के कारण कांग्रेसी नेता विजय शंकर तिवाड़ी ने यह सीट मांगी थी और इसके लिए दिल्ली में उन्होंने अनोखा प्रदर्शन भी किया था लेकिन खाचरियावास की बिग छवि होने के कारण पार्टी ने उनको यहां से उतारा अब उनको अपनो से ही भीतरीघात होने की आशंका जताई जा रही है।
राजपूत वोटबैंक खिसकने का डर
विद्याधर नगर में कांग्रेस को अपना ही वोटबैंक खिसकने का डर है। यहां पर राजपूत बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण राजपूत समाज से कांग्रेसी नेता रहे विक्रमसिंह शेखावत, देवन्द्र बुटाटी ने टिकट मांगा था लेकिन पार्टी ने यहां से वैश्य समाज के प्रत्याशी पर भरोसा करते हुए सीताराम अग्रवाल को टिकट दिया  इसके बाद विक्रमसिंह शेखावत ने निर्दलीय ताल ठोककर उनकी परेशानियां बढ़ा दी है हालांकि बीजेपी से यहां राजपूत चेहरा नरपत सिंह राजवी है ऐसे में यहां पर बागी से खतरा दोनों का है।
परनामी माने जाते है चाणक्य
आदर्शनगर से भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी लगातार दूसरी बार यहां से लड़ रहे है दो बार जीतने के कारण क्षेत्र की व्यापक समझ उनको है यहां से कांग्रेस ने नए और उघोगपति रफीक खान पर भरोसा जताया है। नए चेहरा कितनी टक्कर दे पाता यह देखने वाली बात होगी वहीं यहां से मुस्लिम समाज के प्रत्याशी बड़ी संख्या में सामने आने से कांग्रेस को खतरा है तो परनामी की पकड़ इस इलाके में अच्छी है।
झोटवाडा में टक्कर
झोटवाडा में दोनों प्रत्याशियों में टक्कर है यहां पर कांग्रेस लालचंद कटारिया दिग्गज कांग्रेसी नेता है तो संघ पृष्ठभूमि से आने वाले राजपाल सिंह शेखावत इमानदार और अडियल मंत्री रहे है। यहां पर उनकी आम जनता से रही दूरी एक नकरात्मक पक्ष है तो इमानदारी, कार्यकर्ताओं में अच्छी पकड़ सकारात्मक। वही लालचंद कटारिया कार्यकर्ताओं और लोगों से जुड़े हुए है। कद्दावार जाट नेता है। इस कारण मुकाबला कांटे का है।

तबादले का भूत, कमजोर प्रत्याशी मुद्दा
मालवीय नगर में बीजेपी के कद्दावर तेज तर्रार और आक्रामक छवि के नेता चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ से कांग्रेस की मालवीय नगर से प्रत्याशी अर्चना शर्मा से टक्कर है। कालीचरण सराफ बड़ा चेहरा और कार्यकर्ताओं में लोकप्रिय है वहीं अर्चना शर्मा पहले से उनसे पिछले साल चुनाव यहां से हार चुकी है। सराफ के मुकाबले क्षेत्र में उनकी पकड़ कमजोर मानी जाती है हालांकि उन्होंने पांच साल काफी मेहनत की है फिर भी सराफ मजबूत पकड़ उनके परेशानियां बढ़ा रहा है हालांकि यहां पर तबादला उद्योग को कांग्रेस भुना रही है जिसकी चिंगारी में परिणाम बदल भी सकते है।

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