खबर - प्रदीप कुमार सैनी/ लिखासिंह सैनी
दांतारामगढ़- दांता के अंतिम राजा शासक दांता ठाकुर मदनसिंह की आज
15वीं पुण्यतिथि हैं। वे अपने नाम के अनुरूप ही दानवीरता के धनी थे। दया,
उदारता तथा जनता के प्रति आत्मय भाव उनका स्वभाव था। उनका देहावसान 23
दिसम्बर, 2001 को 82 वर्ष की आयु में हुआ। उन्होंने दांता पर 3 वर्ष तक
शासन किया। आज वो दीप बुझ चुका हैं। उनका सूर्य अस्त हो गया हैं। लेकिन फिर
भी उनके द्वारा फैलाया गया यश व कीर्ति का प्रकाश आज भी कायम हैं। उस दीप
में त्याग की बाती व सेवा का घी जलता था। आंधी के थपेड़े भी उसे नही बुझा
सके। वह योद्धा जीवनभर लड़ता रहा। उसने अपना सब कुछ अपने ग्राम के विकास के
लिए लुटा दिया। वह कर्मवीर अपने कर्म से कभी विमुख नही हुआ। वह मसीहा
जिसने प्राकृतिक विपदा (बाढ़) के समय अपना सब कुछ दांव पर लगाकर एक सच्चे
राजा की तरह अपनी प्रजा की रक्षा की। भारत चीन युद्ध के दौरान राष्ट्र
सुरक्षा कोष मे एक लाख एक हजार रुपये और एक सोने की मूठ की तलवार दान देकर
उस दानवीर ने सच्ची देशभक्ति का परिचय दिया था। सादा जीवन उच्च विचार ही इस
महान विभूति के आभूषण थे। सवाईमानसिंह गार्ड में द्वितीय लेफ्टिनेंट के पद
रहते हुए दूसरे महायुद्ध में फौज के साथ तीन वर्ष तक रहे। प्रदेश में राम
राज्य परिषद के संस्थापक सदस्यों में रहे। सन् 1955 में राजस्थान के जनसंघ
के अध्यक्ष बने। जब सन् 1956 में पूरे देश प्रदेश में भू-स्वामी आंदोलन
चलाया गया तब दांता ठाकुर मदनसिंह ने ही आंदोलन के सफल संचालन मे
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपनी प्रजा की रक्षा करते हुए लोहार्गल की
पहाड़ियों में सात डाकू मारे व एक को गिरफ्तार किया। दूधवा के सेठ मोहनलाल
के पैंतालीस हजार के गहने डाकू लूटकर ले गए वो वापस लाकर दिये । कुचामन के
एक वैश्य की लड़की को डाकू अगवा करके ले गये उसे भी वापिस लेकर आये। गुना
के जंगलों में आदमखोर शेर को मारा। दांतारामगढ़ विधानसभा के तीन बार विधायक
रहने का गौरव हासिल किया उस समय तीन बार अलग-अलग पार्टी से चुनाव जीते।
अंत में 23 दिसम्बर सन् 2001 को दांता ठाकुर मदनसिंह इस दुनिया को अलविदा
कह गए। इनकी शवयात्रा में बड़े-बड़े नेतागण एवं दांता क्षेत्र के सैकड़ों
लोगों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी । पूरा गांव शोक की लहर में डूब
गया। जो दूसरो के लिए जीते है वे कभी मरते नही, अमर हो जाते हैं।
