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उबासियाँ लाता है नामस्मरण-डॉ. दीपक आचार्य

एक जमाने में कहा जाता था कि जहाँ नाम है वहाँ नाश है लेकिन अब सब तरफ यह उल्टा-पुल्टा हो गया है। अब और कुछ हो न हो, नाम ही मायने रखता है।

अपना नाम जुड़वाने के लिए लोग जिस तरह पीछे पड़े रहते हैं, जो हथकण्डे अपनाते रहते हैं, नाम के पीछे पागल हो जाते हैं, यह अपने आप में वर्तमान का सबसे बड़ा वह कारक है जिस पर लोग हँस भी सकते हैं और रोना भी आ सकता है।

आजकल नाम के चक्कर में फेरे लगाने वाले लोगों का बाहुल्य है। बहुत सारे हैं जो नाम जुड़वाने के लिए प्रयासरत रहते हैं और कई सारे ऎसे भी हैं जो औरों का नाम कटवाने की फिराक में बने रहते हैं।

सब तरफ दो ही तरह का माहौल है -फोटो और नाम का। ये दो न हों तो आदमी काम ही न करे। जो कुछ हो रहा है वह नाम के लिए हो रहा है अथवा तस्वीर के लिए। हर कोई चाहता है कि वह जिस समुदाय में रह रहा है वहाँ के सब लोग उसे जाने-पहचानें और उसे दूसरों के मुकाबले अधिक से अधिक सम्मान, आदर और वीआईपी ट्रीटमेंट प्राप्त होता रहे।

आदमी अब अच्छे कामों और आचरणों से खुश नहीें होता बल्कि केवल नाम स्मरण मात्र से प्रसन्न हो उठता है इसलिए और लोग भी दूसरे सारे प्रयासों को दरकिनार कर केवल बार-बार नामस्मरण को ही अपना चुके हैं।

इन्हें अच्छी तरह पता है कि आज का आदमी केवल अपना ही अपना नाम सब जगह सुनना चाहता है। जो उसकी इस इच्छा को पूर्ण कर दिया करते हैं उन पर वह फिदा हो जाता है। जो ऎसा नहीं कर पाते हैं उन पर कोप बरसने लग जाता है।

सबसे अधिक हैरानी तो उन लोगों को होती है जो एक ही स्थान पर तकरीबन सारे वक्ताओं के श्रीमुख से उस हर किसी का नाम कई-कई बार सुनते रहते हैं। सबकी अपनी -अपनी मजबूरी है। नाम न ले तो लोग त्यौरियां चढ़ा देते हैं और भृकुटी तान दिया करते हैं। इसलिए दूसरे लोग अनचाहे भी नाम स्मरण की इस परंपरा को आगे से आगे निभाते रहते हैं।

और तो और बहुत सारे वक्ताओं के लिए तो नाम स्मरण इतना अधिक अजीर्णवादी हो उठता है कि ये लोग न केवल मंचीय लोगों के नामों का पावन स्मरण कर अपने आपको धन्य और उऋण हुआ मानते हैं बल्कि सामने जमा भीड़ और आजु-बाजु बिराजमान ढेरों लोगोें के नामों का भी उच्चारण करते रहते हैं। जो सामने दिख जाए उसका नाम जुबाँ पर आ ही जाता है।

इस मायने में देखा जाए तो अधिकांश गतिविधियों में बहुत सारा समय केवल नामोच्चारण की पुरातन परंपरा का निर्वाह करने में ही व्यतीत हो जाता है।

एक-दूसरे के नामों का उच्चारण कर स्वयं को प्रफुल्लित महसूस करने या कूटनैतिक सफलता पा लेने के लक्ष्य वाले लोग भले ही प्रसन्नता का अनुभव कर उठते हों मगर जो लोग बार-बार नामोच्चारण को झेलते हैं उनके लिए मुसीबत हो जाया करती है।

इन झेलने वाले लोगों में यह जरूरी नहीं है कि सहिष्णु और सहनशील ही भीड़ में मौजूद हों। बहुत सारे लोग होत हैं जिन्हें इस परंपरा में नीरसता और औचित्यहीनता नज़र आती है और ये लोग मानते हैं कि इससे रचनात्मक गतिविधियों का प्रभाव और सुगंध कम हो जाया करती है और आयोजनों का मकसद पूरा नहीं हो पाता।

एक तरफ यह स्थिति, तो दूसरी ओर संचालकों की खुद को विद्वान और कुशल प्रभावशील वक्ता मनवाने की जिद भी कोई कम नहीं हुआ करती। कुछ संचालक मौके की नजाकत को देखकर अपने आपको संयमित कर लिया करते हैं लेकिन अधिकांश पर इस बात का भूत सवार होता है कि सारे लोग उनके संचालन की तारीफ करें।

इसलिए ये संचालक महोदय अपनी शेरो-शायरियों और काव्य प्रतिभाओं का पूरा का पूरा इस्तेमाल करने के लिए मौके को अच्छी तरह भुना दिया करते हैं। कुछेक समझदार और धीर-गंभीर लोगों को छोड़ दिया जाए तो हरेक संचालक को हमेशा यह भ्रम बना रहता है कि वह जितना अधिक बोलेगा, उतना अधिक सराहना पाएगा।

जबकि आज का समय इतना अधिक तेज गति से बढ़ रहा है कि कम से कम समय में अधिक से अधिक काम और आयोजन सम्पन्न करा लेने का कौशल पैदा करने की जरूरत है। आजकल समय का अभाव सभी के लिए समस्या बना हुआ है। इसलिए हमें उन सभी लोगों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जो हमारे आयोजनों में भागीदार बनते हैं, हमें तसल्ली से सुनते हैं और हमारी वाहवाही करते हैं।

वह समय गया जब लच्छेदार भाषाशैली में संचालन होता था और हर क्षेत्र में इक्का-दुक्का लोग वर्षों तक संचालन की कुर्सी पर काबिज रहकर सम्मान और आदर पाते रहते थे।

समय की मांग है कि हम अपने पुरातन तौर-तरीकों को समय की उपलब्धता के अनुरूप बदलें और ऎसा कुछ करें कि किसी को कोई परेशानी न हो। न ऊपर वाले निराश हों, न जमीन पर और सामने बैठने वाले खिन्न हों।

अवधिपार परंपराओं को बदलने और नवीनता को अंगीकार करते हुए जो समय हमें जीवन में प्राप्त हुआ है उसका भरपूर उपयोग करने की आवश्यकता हर कोई महसूस करने लगा है।

जब सभी लोग चाहते हैं तब क्यों हम आउटडेटेड परंपराओं के निर्वाह में पिछलग्गू बने हुए हैं। कुछ ऎसा नवाचार लाएं कि समय का पूरा उपयोग समाज और देश के हित में हो। सब मिलकर स्वीकारें कि समय बड़ा बलवान है।