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क्या रहेगा घट स्थापना ,कलश स्थापना मुहूर्त जानें आचार्य अभिमन्यू पाराशर जी से-----

नवरात्री में घट स्थापना का बहुत महत्त्व होता है। नवरात्री की शुरुआत घट स्थापना से की जाती है। शुभ मुहूर्त में कलश स्थापित किया जाता है। घट स थापना मुहूर्त  सुबह 6. 03 से 10:22 तक सबसे अच्छा रहेगा।
घट स्थापना प्रतिपदा तिथि के पहले एक तिहाई हिस्से में कर लेनी चाहिए। इसे कलश स्थापना भी कहते है।
कलश को सुख समृद्धि , ऐश्वर्य देने वाला तथा मंगलकारी माना जाता है। कलश के मुख में भगवान विष्णु , गले में रूद्र , मूल में ब्रह्मा तथा मध्य
में देवी शक्ति का निवास माना जाता है। नवरात्री के समय ब्रह्माण्ड में उपस्थित शक्तियों का घट में आह्वान करके उसे कार्यरत किया जाता है।
इससे घर की सभी विपदा दायक तरंगें नष्ट हो जाती है तथा घर में सुख शांति तथा समृद्धि बनी रहती है।घट स्थापना करने की सामग्री और विधि इस प्रकार है :-
घट स्थापना की सामग्री
जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र। यह वेदी कहलाती है।
जौ बोने के लिए शुद्ध साफ़ की हुई मिटटी जिसमे कंकर आदि ना हो।
पात्र में बोने के लिए जौ ( गेहूं भी ले सकते है )
घट स्थापना के लिए मिट्टी का कलश  ( सोने, चांदी या तांबे  का कलश भी ले सकते है )
कलश में भरने के लिए शुद्ध जल
गंगाजल
रोली , मौली
इत्र
पूजा में काम आने वाली साबुत सुपारी
दूर्वा
कलश में रखने के लिए सिक्का ( किसी भी प्रकार का कुछ लोग चांदी या सोने का सिक्का भी रखते है )
पंचरत्न ( हीरा , नीलम , पन्ना , माणक और मोती )
पीपल , बरगद , जामुन , अशोक और आम के पत्ते  ( सभी ना मिल पायें तो कोई भी दो प्रकार के पत्ते ले सकते है )
कलश ढकने के लिए ढक्कन ( मिट्टी का या तांबे का )
ढक्कन में रखने के लिए साबुत चावल
नारियल
लाल कपडा
फूल माला
फल तथा मिठाई
दीपक , धूप , अगरबत्ती
घट स्थापना की विधि –
सबसे पहले जौ बोने के लिए एक ऐसा पात्र लें जिसमे कलश रखने के बाद भी आस पास जगह रहे। यह पात्र मिट्टी की थाली जैसा कुछ हो
तो श्रेष्ठ होता है। इस पात्र में जौ उगाने के लिए मिट्टी की एक परत बिछा दें। मिट्टी शुद्ध होनी चाहिए । पात्र के बीच में कलश रखने की जगह
छोड़कर बीज डाल दें। फिर एक परत मिटटी की बिछा दें। एक बार फिर जौ डालें। फिर से मिट्टी की परत बिछाएं। अब इस पर जल का
छिड़काव करें।
कलश तैयार करें। कलश पर स्वस्तिक बनायें। कलश के गले में मौली बांधें। अब कलश को थोड़े गंगा जल और शुद्ध जल से पूरा भर दें।
कलश में साबुत सुपारी , फूल और दूर्वा डालें। कलश में इत्र , पंचरत्न तथा सिक्का डालें। अब कलश में पांचों प्रकार के पत्ते डालें। कुछ पत्ते
थोड़े बाहर दिखाई दें इस प्रकार लगाएँ। चारों तरफ पत्ते लगाकर ढ़क्कन लगा दें। इस ढ़क्कन में अक्षत यानि साबुत चावल भर दें।
नारियल तैयार करें। नारियल को लाल कपड़े में लपेट कर मौली बांध दें। इस नारियल को कलश पर रखें। नारियल का मुँह आपकी तरफ
होना चाहिए। यदि नारियल का मुँह ऊपर की तरफ हो तो उसे रोग बढ़ाने वाला माना जाता है। नीचे की तरफ हो तो शत्रु बढ़ाने वाला मानते
है , पूर्व की और हो तो धन को नष्ट करने वाला मानते है। नारियल का मुंह वह होता है जहाँ से वह पेड़ से जुड़ा होता है ।
अब यह कलश जौ उगाने के लिए तैयार किये गये पात्र के बीच में रख दें। अब देवी देवताओं का आह्वान करते हुए प्रार्थना करें कि
" हे समस्त देवी देवता आप सभी नौ दिन के लिए कृपया कलश में विराजमान हों “।
आह्वान करने के बाद ये मानते हुए कि सभी देवता गण कलश में विराजमान है। कलश की पूजा करें।
कलश को टीका करें , अक्षत चढ़ाएं , फूल माला अर्पित करें , इत्र अर्पित करें , नैवेद्य यानि फल मिठाई आदि अर्पित करें।
घट स्थापना या कलश स्थापना के बाद देवी माँ की चौकी स्थापित करें।
नौ दिनों तक इन 9 चीजों से करें मां की पूजा------------------
शारदीय नवरात्रि इस बार 21 सितंबर से शुरु हो रही है। नवरात्रि के नौ दिनों में प्रत्येक दिन मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि के आते ही घर-घर में मां के आगमन की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। गुरुवार से शुरू होने वाली नवरात्रि के नौ दिनों में यदि नौ विशेष चीजों का इस्तेमाल किया जाए तो इससे मां की कृपा भक्तों पर बनी रहती है। यहां हम तिथि अनुसार बता रहे हैं, कि किन चीजों से मां की पूजा करनी चाहिए।
प्रथम तिथि
नवरात्रि के पहले दिन मां को गाय से बनी किसी चीज से भोग लगाएं। यदि यह गाय के घी में बनी हों तो और भी अच्छा है। इससे व्यक्ति को रोगों से मुक्ति मिलती है और हर तरह की बीमारी खत्म होती है।
द्वितीय तिथि
नवरात्रि के दूसरे दिन चीनी का इस्तेमाल करें। शक्कर का भोग करें और फिर उसे जरूरतमंदों व मंदिर में दान कर दें।
तृतीय तिथि
नवरात्रि की तृतीय तिथि 23 सितंबर को पड़ रही है। इस दिन मां की पूजा करते समय दूध का इस्तेमाल जरूर करें। इसके बाद इसे दान दे दें। इससे आपकी जिंदगी में आने वाले सभी दुख दूर हा जाएंगे।
चतुर्थी तिथि
नवरात्रि की चतुर्थी को मालपुवा का खासा महत्व है। इस दिन मालपुवा का अपर्ण करके उसे दान देना चाहिए। इससे आपकी फैसले लेने की शक्ति बढ़ती है।
पंचमी तिथि
नवरात्रि में केले का भी महत्व है। पूजा अर्चना में केले का इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया जाता है। मान्यता है कि पांचवें दिन केले को पूजा अर्चना के दौरान चढ़ाना चाहिए। इसके साथ ही इसे किसी ब्राह्मण को दान कर दें। 
षष्ठी तिथि 
नवरात्रि के छठवें दिन शहद का काफी महत्व है। इस दिन मां की पूजा करने के दौरान शहद का अपर्ण जरूर करें और फिर इसे दान कर दें।
सप्तमी तिथि
पहले के समय में जब भी किसी के घर मेहमान आता था तो गुड़ खाने को दिया जाता था। लेकिन समय बीतने के साथ ही गुड़ का प्रयोग कम होता गया। हालांकि, पूजा अर्चना में गुड़ अभी भी शामिल किया जाता है। ऐसे में नवरात्रि की सप्तमी को की जाने वाली पूजा में गुड़ का उपयोग जरूर करें।
अष्टमी तिथि
नवरात्रि में पूजन के समय जिस का उपयोग सबसे ज्यादा होता है, वह नारियल ही है। मां को नारियल चढ़ाया जाता है। ऐसे समय में अष्टमी में नारियल जरूर चढ़ाएं। यह लोगों में मौजूद किसी भी तरह की पीड़ा को दूर करता है।
नवमी तिथि
दिवाली में मां की पूजा करने के समय धान के लावा को शामिल किया जाता है। यह सिर्फ दिवाली में ही नहीं, बल्कि नवरात्रि में भी काफी इस्तेमाल होता है। मान्यता है कि नवरात्रि के नवमी को यदि धान का लावा से पूजा की जाए तो इससे जीवन में खुशहाली आती है।