खबर - अनिल मिंतर
नवलगढ़ - ये सवाल सबसे पहले मेरे लिए क्योकि में खुद इस मुहीम को मकर संक्रांति के बाद भूल गया था। नवलगढ़ के सभी समाचार पत्रों , राजसमाचार अन्य सोशल मिडिया में पिछले वर्ष इस मामले को बड़ी जोर शोर से उठाया था। लेकिन जैसे ही मकरसंक्रांति गयी और हम भूल गए। अब संक्रांति आयी और हमें चाइनीज मांझे की याद आयी। अब हर जगह मांझा जलाया जायेगा , हम मिडिया वाले भी जायेंगे अख़बारों और सोशल मिडिया पर खूब दिखाया जायेगा वाही वाही होगी ,कुछ मांझा बेचते हुए पकडे जायेंगे। उनकी जमानत हो जाएगी फिर मकरसंक्रांति आएगी हम पतंग उड़ायेंगे। फिर चाइनीज मांझे को भूल जायेंगे। मेरा को सभी से एक ही बात कहनी है की क्यों ना इस मुहीम को जब तक चलाया जाये तब तक चाइनीज मांझे का खात्मा ना हो जाये। जितने भी समाजसेवी जो सच भला चाहते है वो मेरी बात को समझे। मिडिया में आने का शोख सभी को होता है, आना भी चाहिए। उत्साह बढ़ता है। पर उस उत्साह को कायम रखने के लिए जनसेवा को लगातार जारी रखना चाहिए। देखिये किसी का जीवन बचता है तो इससे ख़ुशी की क्या बात होगी। पिछले वर्ष भी हम जागे , एक सोशल मिडिया पर एक मेसेज आया था ,नवलगढ़ के ही है अनिल कुमार शर्मा "ढोला " उन्होंने ग्रुप्स में भेजा था। जिसने चाइनीज मांझे से होने वाले दुष्परिणामों को बताया था जनता ने खूब साथ दिया ,ये मुहीम नवलगढ़ से बाहर गयी ,पुरे शेखावाटी में फ़ैल गयी। लोगो को फायदा भी हुआ ,लेकिन फिर वही चायनीज मांझा बाजार में आ गया है।
