समाज का असली चेहरा उसके नारों में नहीं, उसके परिणामों में दिखता है!
- सिद्धांतों का प्रदर्शन और चरित्र की वास्तविकता अलग-अलग चीजें हैं।
क्योंकि भीतर (जो जैसा स्व लिए वास्तव में है) जो पलता है, अंततः बाहर परिणाम प्रभाव में वही प्रकट होता है, निर्णायक सिद्ध होता है।
- जब अपराधी का पैसा स्वीकार्य और उसका अपराध अस्वीकार्य बताया जाए, तो समझिए विरोध अपराध से नहीं, उसकी बदनामी से है।
किसी व्यक्ति या समाज को समझना हो, तो केवल उसके भाषण, आदर्श, नियम और दावों को मत देखिए।
यह देखिए कि उसके व्यवहार से वास्तव में पैदा क्या हो रहा है, उसकी व्यवस्था में कौन-सी प्रवृत्तियाँ फल-फूल रही हैं और उसकी सामूहिक चुप्पी किन चीजों को स्वीकार्यता दे रही है।
किसी समाज की पहचान वह नहीं है, जो वह अपने बारे में बताता है;
उसकी पहचान वह है, जो उसके व्यवहार से बार-बार सामने आता है।
हर समाज अपने आदर्श गिनाता है।
कोई धर्म की दुहाई देता है,
कोई ईमानदारी की,
कोई देशभक्ति की, कोई पर्यावरण संरक्षण की, कोई जीव रक्षा की,
कोई शक्ति होने की, गौरवशाली बलिदान की,
कोई मेहनतकश और बहादुरी की,
लेकिन इन आदर्शों की वास्तविक परीक्षा तब होती है, जब उनके सामने पैसा, स्वार्थ, रिश्तेदारी, सत्ता या निजी लाभ खड़ा होता है।
सिद्धांतों की असली ताकत तब पता चलती है, जब उन्हें मानने की कीमत चुकानी पड़े।
यदि कोई व्यक्ति ईमानदारी की बातें करता है,
लेकिन लाभ के लिए बेईमानी चुनता है, तो उसकी असली प्राथमिकता उसका भाषण नहीं, उसका चुनाव है।
यदि कोई समाज जीवदया का गौरव गाता है, लेकिन अपने आसपास के दूसरे नैतिक सवालों पर सुविधानुसार चुप रहता है, तो उसके आदर्शों और व्यवहार के बीच का अंतर स्वयं एक सामाजिक तथ्य बन जाता है।
आदर्श बताता है कि हम क्या होना चाहते हैं; व्यवहार बताता है कि हम वास्तव में क्या चुनते हैं।
यही मनोविज्ञान व्यक्ति पर भी लागू होता है और समाज पर भी।
कोई व्यक्ति अपने भीतर की गलत प्रवृत्ति से नफरत करने का दावा कर सकता है,
लेकिन यदि वह उसी प्रवृत्ति को बार-बार सहन करता है, उससे लाभ उठाता है या उसके विरुद्ध बोलने से बचता है, तो उसका वास्तविक नजरिया उसके दावों से अलग हो सकता है।
समाज में भी यही होता है।
कोई अपराध का विरोध करने का दावा करे, लेकिन अपराध करने वाले को केवल इसलिए सम्मान दे कि वह अपना है, प्रभावशाली है या आर्थिक लाभ पहुँचा सकता है, तो उसके प्रतिरोध और उसकी वास्तविक प्राथमिकताओं के बीच विरोधाभास दिखाई देता है।
किसी गलत काम का विरोध करने का दावा और उसके लिए सामाजिक जगह बनाए रखना—दोनों एक साथ नहीं चल सकते, कम-से-कम बिना नैतिक विरोधाभास के तो नहीं।
यहाँ एक बारीक फर्क समझना जरूरी है।
किसी समाज में कोई अपराध हो जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पूरा समाज वैसा है,
लेकिन यदि कोई प्रवृत्ति बार-बार सामने आए, उसे रोकने के बजाय संरक्षण मिले, उसके लाभार्थियों को प्रतिष्ठा मिले और उसके विरुद्ध आवाज उठाने वालों को ही गलत ठहराया जाए, तो सवाल केवल व्यक्तिगत अपराध का नहीं रह जाता।
वह सामाजिक स्वीकार्यता, प्रोत्साहन और सामूहिक प्राथमिकताओं का सवाल बन जाता है।
किसी बुराई की मौजूदगी से अधिक गंभीर बात यह है कि समाज उसके साथ कैसा व्यवहार करता है—उसे रोकता है, सहता है या सम्मानित करने लगता है।
यदि नियमों की दुहाई देने वाले लोग अपने बीच गलत काम करने वालों से भी सवाल पूछते हैं, अवैध कमाई को प्रतिष्ठा नहीं मानते, नशे के कारोबार के विरुद्ध खड़े होते हैं और अपराधी चाहे अपना हो या पराया, कानून की समान कसौटी स्वीकार करते हैं, तो उनके आदर्श व्यवहार में उतरते दिखाई देते हैं।
लेकिन यदि सिद्धांत केवल दूसरों को घेरने के लिए याद आते हैं, अपने लोगों की बारी पर चुप्पी छा जाती है और पैसे या रसूख के सामने नैतिकता बदल जाती है, तो समस्या नियमों की कमी नहीं, उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति की है।
नियमों की संख्या चरित्र तय नहीं करती; नियमों के सामने लिए गए फैसले करते हैं।
धर्म की प्रतिष्ठा का दावा तभी विश्वसनीय है, जब वह नैतिक आचरण में दिखाई दे।
अपराध के विरोध का दावा तभी वास्तविक है, जब अपने लोगों के अपराध पर भी वही मानदंड लागू हों।
यहाँ केवल विरोध करना या प्रतिकार का प्रदर्शन करना पर्याप्त नहीं है।
यदि किसी प्रवृत्ति को शब्दों में नकारा जाए, लेकिन व्यवहार में उसके लिए जगह, सम्मान और लाभ बना रहे, तो उसका प्रभाव भाषण से नहीं, उस व्यवहार से तय होगा जो वास्तव में चल रहा है।
इसीलिए किसी व्यक्ति या समाज का मूल्यांकन उसके घोषित इरादों के साथ-साथ उसके लगातार दिखाई देने वाले व्यवहार, फैसलों और परिणामों से करना चाहिए।
परिणाम अकेले किसी के मन की पूरी सच्चाई नहीं बताते, लेकिन बार-बार दोहराए गए व्यवहार और उनके प्रति सामाजिक प्रतिक्रिया बहुत कुछ उजागर कर देते हैं।
अंततः मनुष्य और समाज की असली पहचान उस क्षण सामने आती है, जब आदर्श और स्वार्थ आमने-सामने होते हैं।
उस समय वह क्या कहता है, इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि वह किसका साथ देता है, किसे रोकता है, किसे संरक्षण देता है और किस कीमत पर अपने सिद्धांतों से समझौता करता है।
क्योंकि चरित्र वह नहीं, जो हम अपने बारे में घोषित करते हैं; चरित्र वह है, जिसे हमारे फैसले बार-बार प्रमाणित करते हैं।
और समाज का वास्तविक चेहरा भी उसके नारों, नियमों या गौरवगाथाओं से अकेले तय नहीं होता।
वह इस बात से सामने आता है कि उसकी सामूहिक जीवनशैली किन मूल्यों को बढ़ावा देती है, किन गलतियों को बर्दाश्त करती है और अंततः अगली पीढ़ी के लिए कैसी मिसाल छोड़ती है।
समाज का असली चेहरा उसके मंचों पर नहीं, उन लोगों के सम्मान में दिखता है जिन्हें वह अपना नायक चुनता है।
गलत काम से नफरत का दावा आसान है; गलत काम करने वाले अपने हों, तब भी विरोध करना चरित्र है।
नारे चरित्र का विज्ञापन हो सकते हैं, प्रमाण नहीं; असली प्रमाण वह व्यवहार है, जिसे समाज रोज दोहराता है।
जयहिंद, सादर
राजाराम लेघा, पुलिस इंस्पेक्टर, राजस्थान।
