रिपोर्ट - महिपाल मील
16 वर्षीय बालक पंकज 12 साल से जकड़ा है सांकलों में,
मंडावा क्षेत्र के सीगड़ा गांव की है कहानी,
पंकज को चार साल की उम्र में अचानक तेज बुखार के बाद नहीं हुआ स्वास्थ्य में सुधार,
बालक हंसने-खेलने की उम्र में ही बंध गया सांकलों में,
बालक पंकज को सांकलो में जकड़ा देखकर परिवान जन है दु:खी,
चिकित्सों को दिखाई लेकिन नहीं हुआ सुधार,
बालक की जिंदगी चल रही है भगवान भरोसे,
परिवार की आर्थिक हालत है दयनीय,
मंडावा- जहां बालक का जीवन खेलने- हंसने,मौज-मस्ती, खाने -पीने का होता है। वही एक बालक तीन-चार नॉरमल जिंदगी जीने के बाद न केवल उनका खेलना कूदना हंसना सहित सब मौज मस्ती गायब हो गई। बल्कि हंसने खेलने के दिनों में उसकी जिदंगी सांकलों में जकड़ गई है। ओर तो ओर वह अपनी सुवधा व अावश्यकता के कार्यो के लिए बोल भी नहीं बता सकता है। अनबोल व सांकलो में जकड़ी ये जिंदगी एक बालक 12 सालों से झेल रहा है और कब तक इस प्रकार की जिदंगी जीने को मजबूर रहेगा। यह सब भगवान भरोसे ही है। यह कहानी मंडावा क्षेत्र के सीगड़ा गांव में रहने वाले भंवरलाल मेघवाल के छोटे बेटे पंकज कुमार की है। वाहिदपुरा रोड़ पर स्थित खेत में ढ़ाणी बनाकर रहे सुलतान मेघवाल ने जी मीडिया से बातचीत के दौराने बताया कि उसका पोता पंकज कुमार तीन साल का था। उस समय तक सब ठीक ठाक था। उसका पोता पंकज भी अन्य बच्चों की तरह आंगन में खेलता ओर मोज मस्ती के साथ बातचीत भी करता था। बच्चा अन्य बच्चों की तरह सामन्य था। एक दिन अचानक पंकज कुमार को बहुत तेज बुखार आई। तो झुंझुनूं में बच्चों के डाक्टर धर्मवीर के पास लेकर गये। चार-पांच दिन दवाईयां देने के बाद कहां घर ले जाओं। लेकिन पंकज का बुखार ठीक नहीं हुआ। फिर बालक को सीकर चिकित्सा के लिए लेकर गऐ। वहां भी दो दिन इलाज करने बाद चिकित्सों ने कहा कि बालका का ऑपरेशन होगा। फिर भी बालक सही होगा या नहीं कह नहीं सकते । वहां निराश होकर बालक पंकज को घर लेकर आ गए। पीड़ित पंकज के दादा सुलतान ने बताया कि कुछ दिनों बाद पंकज को चिकित्सा के लिए बीकानेर लेकर गए। वहां चिकित्सों ने बताया कि इस बच्चे का इलाज संभव नहीं है। पैसा व समय खराब करने कोई फायदा नहीं है। बालको घर ले जाओं। उसकें बाद मजबूरन पंकज को घर लेकर आ गए। समय के साथ धीरे- धीरे पंकज के दिमांग में सुनापन आने लगा। कुछ महिनों बाद ही बालक ने बोलना भी बंद कर दिया। हर कभी तोड़ फोड़ करने लगता है व इधर-उधर भागने लगता है। इस भय से की कही पंकज भाग नहीं जाऐ ओर दिमांग में सुनापन के कारण कहीं गिर कर मर नहीं जाए। इसलिए आज तक 16 वर्षीय बालक पंकज को सांकल से बांधकर रखना पड़ रहा है। पंकज की माता सुशीला देवी ने कहा कि चार साल के बाद पंकज अनाचक बिमार हो गया। उसके बाद दिन प्रतिदिन बालक की हालत खराब होती चली गई। अब हर कभी दौरे पड़ने लगते है। दौरा आने पर शरीर अकड़ जाता है और घर में जो भी हाथ लेगे उसकों तोड़ फोड़ करने लगता है। उसकी दिमांग की हालत भी सही नहीं है। अब बोल भी नहीं सकता है और नहीं कोई बात समझता है। खाना, पिलाना, नहाना व कपड़े बदलना अपने हिसाब से करवा देते हैं। ज्यो ज्यो बालका की उम्र बढ़ती जा रही है त्यो त्यो चिंता भी बढ़ती जा रही है। कि कब तक ये सब ऐसे ही चलता रहेगा। भगवान के भरोसे है। बालक पंकज को देख देखकर परिवार वाले बहुत ही दुखी है।
परिवार की आर्थिक हालत है बहुत ही दयनीय:-
पंकज का पिता भंवर लाल मेघवाल चिड़ावा में एक प्राईवेट स्कूल में र्क्लक का काम करता है। दादा सुलतान भी खेती का काम ही करता है। भंवरलाल की बड़ा बेटा पवन कुमार एमएससी में पढ़ रहा है। बेटी नीतू बीएससी में पढ़ रही है। छोटा बेटा पंकज कुमार अनजान बिमारी के कारण 12 साल से सांकलों में जकड़ा है। ऐसे पंकज के पिता भंवरलाल मुश्किल से परिवार का खर्चा वहन कर पा रहे है। उधर छोटे बेटे पंकज को सांकलों में जकड़ा देखकर सभी परिवार जन मायुस व दु:खी है। लेकिन भगवान भरोसे व भगवान की मर्जी बताकर आत्मा को मजबूत कर लेते है।
मंडावा क्षेत्र के सीगड़ा गांव की है कहानी,
पंकज को चार साल की उम्र में अचानक तेज बुखार के बाद नहीं हुआ स्वास्थ्य में सुधार,
बालक हंसने-खेलने की उम्र में ही बंध गया सांकलों में,
बालक पंकज को सांकलो में जकड़ा देखकर परिवान जन है दु:खी,
चिकित्सों को दिखाई लेकिन नहीं हुआ सुधार,
बालक की जिंदगी चल रही है भगवान भरोसे,
परिवार की आर्थिक हालत है दयनीय,
मंडावा- जहां बालक का जीवन खेलने- हंसने,मौज-मस्ती, खाने -पीने का होता है। वही एक बालक तीन-चार नॉरमल जिंदगी जीने के बाद न केवल उनका खेलना कूदना हंसना सहित सब मौज मस्ती गायब हो गई। बल्कि हंसने खेलने के दिनों में उसकी जिदंगी सांकलों में जकड़ गई है। ओर तो ओर वह अपनी सुवधा व अावश्यकता के कार्यो के लिए बोल भी नहीं बता सकता है। अनबोल व सांकलो में जकड़ी ये जिंदगी एक बालक 12 सालों से झेल रहा है और कब तक इस प्रकार की जिदंगी जीने को मजबूर रहेगा। यह सब भगवान भरोसे ही है। यह कहानी मंडावा क्षेत्र के सीगड़ा गांव में रहने वाले भंवरलाल मेघवाल के छोटे बेटे पंकज कुमार की है। वाहिदपुरा रोड़ पर स्थित खेत में ढ़ाणी बनाकर रहे सुलतान मेघवाल ने जी मीडिया से बातचीत के दौराने बताया कि उसका पोता पंकज कुमार तीन साल का था। उस समय तक सब ठीक ठाक था। उसका पोता पंकज भी अन्य बच्चों की तरह आंगन में खेलता ओर मोज मस्ती के साथ बातचीत भी करता था। बच्चा अन्य बच्चों की तरह सामन्य था। एक दिन अचानक पंकज कुमार को बहुत तेज बुखार आई। तो झुंझुनूं में बच्चों के डाक्टर धर्मवीर के पास लेकर गये। चार-पांच दिन दवाईयां देने के बाद कहां घर ले जाओं। लेकिन पंकज का बुखार ठीक नहीं हुआ। फिर बालक को सीकर चिकित्सा के लिए लेकर गऐ। वहां भी दो दिन इलाज करने बाद चिकित्सों ने कहा कि बालका का ऑपरेशन होगा। फिर भी बालक सही होगा या नहीं कह नहीं सकते । वहां निराश होकर बालक पंकज को घर लेकर आ गए। पीड़ित पंकज के दादा सुलतान ने बताया कि कुछ दिनों बाद पंकज को चिकित्सा के लिए बीकानेर लेकर गए। वहां चिकित्सों ने बताया कि इस बच्चे का इलाज संभव नहीं है। पैसा व समय खराब करने कोई फायदा नहीं है। बालको घर ले जाओं। उसकें बाद मजबूरन पंकज को घर लेकर आ गए। समय के साथ धीरे- धीरे पंकज के दिमांग में सुनापन आने लगा। कुछ महिनों बाद ही बालक ने बोलना भी बंद कर दिया। हर कभी तोड़ फोड़ करने लगता है व इधर-उधर भागने लगता है। इस भय से की कही पंकज भाग नहीं जाऐ ओर दिमांग में सुनापन के कारण कहीं गिर कर मर नहीं जाए। इसलिए आज तक 16 वर्षीय बालक पंकज को सांकल से बांधकर रखना पड़ रहा है। पंकज की माता सुशीला देवी ने कहा कि चार साल के बाद पंकज अनाचक बिमार हो गया। उसके बाद दिन प्रतिदिन बालक की हालत खराब होती चली गई। अब हर कभी दौरे पड़ने लगते है। दौरा आने पर शरीर अकड़ जाता है और घर में जो भी हाथ लेगे उसकों तोड़ फोड़ करने लगता है। उसकी दिमांग की हालत भी सही नहीं है। अब बोल भी नहीं सकता है और नहीं कोई बात समझता है। खाना, पिलाना, नहाना व कपड़े बदलना अपने हिसाब से करवा देते हैं। ज्यो ज्यो बालका की उम्र बढ़ती जा रही है त्यो त्यो चिंता भी बढ़ती जा रही है। कि कब तक ये सब ऐसे ही चलता रहेगा। भगवान के भरोसे है। बालक पंकज को देख देखकर परिवार वाले बहुत ही दुखी है।
परिवार की आर्थिक हालत है बहुत ही दयनीय:-
पंकज का पिता भंवर लाल मेघवाल चिड़ावा में एक प्राईवेट स्कूल में र्क्लक का काम करता है। दादा सुलतान भी खेती का काम ही करता है। भंवरलाल की बड़ा बेटा पवन कुमार एमएससी में पढ़ रहा है। बेटी नीतू बीएससी में पढ़ रही है। छोटा बेटा पंकज कुमार अनजान बिमारी के कारण 12 साल से सांकलों में जकड़ा है। ऐसे पंकज के पिता भंवरलाल मुश्किल से परिवार का खर्चा वहन कर पा रहे है। उधर छोटे बेटे पंकज को सांकलों में जकड़ा देखकर सभी परिवार जन मायुस व दु:खी है। लेकिन भगवान भरोसे व भगवान की मर्जी बताकर आत्मा को मजबूत कर लेते है।
