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क्यों नहीं सुनती सरकार, सीताराम के बूढ़े माँ बाप की .......................................

रिपोर्ट - संजय बारी
6 साल से जंजीर में बंधा हैं 
सीताराम बुड्ढे मां बाप के कंधों पर जवान बेटे का बोझ
 सीताराम का परिवार ना तो खाद्य सुरक्षा से जुड़ा हुआ है
ना ही उसके पास किसी प्रकार का मेंटल सर्टिफिकेट है
नवलगढ़ :--कस्बे  के देवपुरा बणी ग्राम पंचायत के हर मां बाप का सपना होता है कि उसके बच्चे बड़े होकर बुढ़ापा का सहारा बनेंगे । ऐसा ही एक मामला चिराना के निकटवर्ती ग्राम देवपुराबणी में देखने को मिला जहां बूढ़े मां बाप पर कुदरत की ऐसी मार पड़ी कि आज बुड्ढे दंपति को अपने पुत्र का सहारा बनना पड़ रहा है यह पिछले 6 वर्षों से अपने पुत्र की देखभाल कर रहे हैं देवपुरा  बणी निवासी सीताराम पुत्र रूडाराम गुर्जर जिनकी उम्र 25 वर्ष है जिसे बड़ा होता देखकर रुडाराम भविष्य के सपने बुनता था लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था उस के सपनों पर ऐसा पहाड़ टूटा की सारे सपने चकनाचूर हो गए खेलने खाने की उम्र में उसका पुत्र सीताराम  को 2011 मे अचानक दौरे आने शुरू हो गए और वह मानसिक रुप से विक्षिप्त होने लगा हालत यह हो गयी कि सीताराम को मानसिक असंतुलन व अक्रामकता स्वभाव के कारण जंजीर से बांध कर रखा जाने लगा ।

आर्थिक रुप से कमजोर रुडाराम ने अपनी आंखो के नूर के इलाज के लिए हर देवरी मत्था टेका मानो भगवान उससे रूठ बैठा हो जमा पूंजी से मनोरोगी विशेषज्ञो को 2011 से 2013 तक सीकर के चिकित्सकों को दिखाया व बाद मन्दिर व देवरो मे दिखाया तथा चिकित्सकों ने भारी भरकम खर्चे की बात कही तो वह निराश होकर लौट आया अब हालत यह है कि सीताराम 25 साल का हो चुका है उसकी सोच समझ की क्षमता अब चली गई है बूढ़े मां बाप सीताराम को पिछले 6 सालों से सांकल से जकड़कर ध्यान रखने को मजबूर हैं 
खाना खिलाने से लेकर उसकी दैनिक दिनचर्या का ख्याल उसके परिवार भाई, भाभी ,पत्नी कर रहे हैं वही 70 साल के रुड़ाराम को अपने बेटे की भविष्य की चिंता सताने लगी है पर रुदें गले से बताते हैं कि अब तक तो जैसे तैसे पुत्र का ध्यान रखा लेकिन उनके मरने के बाद क्या होगा हालांकि रूडा राम के 3 पुत्र 3 पुत्रियां है जिसमें से सीताराम सबसे छोटा पुत्र है सीताराम की शादी 2011 मे लोहार्गल निवासी रोशनी देवी से हुई थी आज उसकी 4साल पुजा व 2साल कि गुड़ियां दो पुत्रियां है 

रुडाराम की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर है उसका बड़ा बेटा मेहनत मजदूरी कर अपने परिवार का  पालन पोषण कर रहा है हालांकि  
साक्षरता व कागजी जानकारी के अभाव में समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है सीताराम का परिवार ना तो खाद्य सुरक्षा से जुड़ा हुआ है ना ही उसके पास किसी प्रकार का मेंटल सर्टिफिकेट है।
 
 ना ही उससे किसी भी प्रकार की पेंशन प्राप्त हो रही है 

अब सरकार से उम्मीद है कि सीताराम पर ध्यान दें और उसका इलाज करवा कर बेडियो से मुक्त कराएं।
 
  ये खबर पहले भी कई अख़बारों और चैनलों पर चल  चुकी है ना तो कोई भामाशाह आगे आया और ना ही  सरकार का नुमाईंदा।