डूंडलोद । कुछ सपने केवल किसी एक व्यक्ति के नहीं होते, बल्कि पूरे परिवार की विरासत बन जाते हैं। ऐसे ही एक सपने को साकार किया है डूंडलोद के डॉ. जय पारीक ने। यह सिर्फ एक बेटे की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि दादा की इच्छा, पिता के त्याग, दादी के आशीर्वाद और पूरे परिवार के विश्वास की भावुक दास्तान है।
इस संबंध में जब हमारी बातचीत नवलगढ़ नगरपालिका के पूर्व उपाध्यक्ष एवं समाजसेवी कैलाश चोटिया से हुई, जो डॉ. जय पारीक के पिता अशोक पारीक के मामाजी भी हैं, तो उन्होंने भावुक होते हुए बताया कि स्वर्गीय ओमजी महाराज (पारीक) की हमेशा से यही इच्छा थी कि उनका पौत्र जय ऐसा डॉक्टर बने, जो केवल इलाज ही न करे, बल्कि समाज और जरूरतमंद लोगों की सच्चे मन से सेवा करे।
उन्होंने बताया कि ओमजी महाराज अक्सर कहा करते थे कि डॉक्टर का सबसे बड़ा धर्म मानव सेवा है। उनके इसी विचार और संस्कार ने बचपन से ही जय के मन में सेवा की भावना जगाई। इस लक्ष्य को पाने के लिए जय ने वर्षों तक कठिन परिश्रम किया और हर चुनौती का डटकर सामना किया।
कैलाश चोटिया ने बताया कि जय की दादी और मेरी बड़ी बहन बिमला देवी पारीक का स्नेह और आशीर्वाद हर कदम पर उनके साथ रहा। वहीं उनके चाचा शंकर पारीक ने भी परिवार की जिम्मेदारियों के साथ हर परिस्थिति में जय का मनोबल बढ़ाया और हर संभव सहयोग दिया। पूरे परिवार ने मिलकर उस सपने को जीवित रखा, जिसे स्वर्गीय ओमजी महाराज ने वर्षों पहले देखा था।
उन्होंने कहा, "आज जब जय डॉक्टर बनकर लोगों की सेवा के लिए तैयार हैं, तो ऐसा लगता है कि ओमजी महाराज की आत्मा भी जहां कहीं होगी, अपने पौत्र पर गर्व कर रही होगी। उनका सपना आज सच हो गया है।"
इसके बाद हमारी बातचीत डॉ. जय पारीक के पिता अशोक पारीक से हुई। बेटे की सफलता का जिक्र करते हुए उनकी आवाज में गर्व के साथ भावुकता भी साफ झलक रही थी।
अशोक पारीक ने बताया कि बचपन से जय का सपना डॉक्टर बनने का नहीं, बल्कि पायलट बनने का था। उसे आसमान में उड़ान भरने का शौक था और वह उसी दिशा में आगे बढ़ना चाहता था। लेकिन जब उसने अपने दादाजी की वर्षों पुरानी इच्छा को समझा, तो उसने बिना किसी शिकायत के अपना सपना बदल दिया।
उन्होंने कहा, "जय ने अपने मन की इच्छा से पहले अपने दादाजी के सपने को महत्व दिया। उसने ठान लिया कि वह डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करेगा। उसी संकल्प के साथ उसने दिन-रात मेहनत की और आज उस मुकाम पर पहुंचा है, जहां उसके दादाजी का सपना साकार हो चुका है।"
अशोक पारीक ने कहा कि किसी भी माता-पिता के लिए इससे बड़ी खुशी नहीं हो सकती कि उनका बेटा अपने बुजुर्गों के सपनों और संस्कारों का सम्मान करे। जय ने केवल डॉक्टर बनने की डिग्री हासिल नहीं की, बल्कि परिवार की वर्षों पुरानी भावना और विश्वास को भी जीवंत कर दिया।
डॉ. जय पारीक की यह यात्रा बताती है कि सफलता केवल ऊंचे पद या बड़े नाम से नहीं मापी जाती, बल्कि उन मूल्यों से मापी जाती है जिनके लिए इंसान अपने निजी सपनों तक का त्याग कर देता है। एक ओर दादा का सपना था, दूसरी ओर बेटे का अपना सपना, लेकिन परिवार के संस्कारों ने अंततः सेवा का रास्ता चुना।
आज डॉ. जय पारीक की सफलता केवल उनके परिवार की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो अपने जीवन में बड़े सपने देखते हैं। यह कहानी बताती है कि जब मेहनत के साथ बुजुर्गों का आशीर्वाद, परिवार का विश्वास और समाज की सेवा का संकल्प जुड़ जाए, तो हर सपना साकार हो जाता है।
वास्तव में, यह केवल एक डॉक्टर बनने की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसे परिवार की कहानी है जिसने पीढ़ियों से मिले संस्कारों को जीवित रखा और यह साबित कर दिया कि अपने बुजुर्गों के सपनों को सम्मान देना भी जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।
