राजस्थान में पंचायत चुनाव का तीसरा चरण इस बार एक ऐसी तारीख के आसपास आ रहा है, जिसने चुनावी कार्यक्रम को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि चुनाव कब होगा।
सवाल यह है कि क्या मतदान की तारीख ऐसी है, जिसमें प्रदेश का हर मतदाता बिना किसी अतिरिक्त सामाजिक, पारिवारिक या कारोबारी दबाव के अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेगा?
क्योंकि जिस दिन मतदान प्रस्तावित है, उसी दिन धनतेरस है।
और धनतेरस राजस्थान के गांवों और कस्बों के लिए महज कैलेंडर की एक तारीख नहीं है।
यह दिन बाजारों के लिए महत्वपूर्ण है।
व्यापारियों के लिए महत्वपूर्ण है।
परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है।
और खास तौर पर महिलाओं के लिए यह दीपावली की तैयारियों के सबसे व्यस्त दिनों में से एक होता है।
घर की साफ-सफाई से लेकर पूजा की तैयारियां, खरीदारी से लेकर घर-परिवार की दूसरी व्यवस्थाएं—त्योहार से जुड़े कामों का दबाव इसी समय बढ़ जाता है।
दूसरी तरफ बाजारों की तस्वीर देखिए।
धनतेरस पर खरीदारी बढ़ती है। सर्राफा बाजार, कपड़ा बाजार, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और छोटे-बड़े स्थानीय कारोबार—कई व्यापारियों के लिए यह साल के महत्वपूर्ण कारोबारी दिनों में शामिल होता है।
ऐसे में एक दुकानदार के सामने व्यावहारिक सवाल खड़ा होता है—
वह अपनी दुकान संभाले या मतदान के लिए समय निकाले?
इसी तरह किसी दुकान या प्रतिष्ठान में काम करने वाले कर्मचारी के सामने भी समय का सवाल हो सकता है।
ग्रामीण परिवारों की अपनी व्यस्तताएं हैं।
दीपावली की खरीदारी, घर की तैयारियां, रिश्तेदारों का आना-जाना और दूसरे जरूरी काम पहले से तय रहते हैं।
ऐसे माहौल में मतदान के लिए समय निकालना कुछ लोगों के लिए आसान हो सकता है, लेकिन कुछ मतदाताओं के लिए यह अतिरिक्त चुनौती भी बन सकता है।
और यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—
क्या चुनाव की तारीख तय करते समय स्थानीय सामाजिक और त्योहारों की परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व दिया गया है?
यह कहना जल्दबाजी होगी कि धनतेरस के दिन मतदान होने से निश्चित रूप से मतदान प्रतिशत कम हो जाएगा।
मतदान प्रतिशत कई कारणों पर निर्भर करता है।
लेकिन यह संभावना जरूर है कि त्योहार की व्यस्तता कुछ मतदाताओं के लिए मतदान केंद्र तक पहुंचने में बाधा बन सकती है।
और लोकतंत्र में सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि मतदान की व्यवस्था उपलब्ध है या नहीं।
सवाल यह भी होना चाहिए कि मतदाता के लिए उस व्यवस्था तक पहुंचना कितना आसान है।
खास तौर पर तब, जब पंचायत चुनाव सीधे गांव के सामाजिक और राजनीतिक जीवन से जुड़े होते हैं।
महिलाओं के मतदान को लेकर भी सवाल
पंचायत व्यवस्था में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है।
लेकिन ग्रामीण भारत में घरेलू जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा आज भी महिलाओं के ऊपर रहता है।
दीपावली जैसे बड़े त्योहार के ठीक पहले घर की जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं।
ऐसे में यह सवाल पूछना स्वाभाविक है कि क्या चुनाव की तारीख ऐसी होनी चाहिए, जिसमें महिलाओं को अपने घरेलू दायित्व और मतदान के बीच समय का संतुलन बनाना पड़े?
यह किसी राजनीतिक दल का सवाल नहीं है।
यह किसी उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष का सवाल नहीं है।
यह मतदाता की सुविधा का सवाल है।
व्यापारियों के लिए भी असामान्य परिस्थिति
धनतेरस पर बाजारों में कारोबार बढ़ने की संभावना रहती है।
छोटे दुकानदारों के लिए दुकान बंद करके मतदान करने जाना हमेशा आसान नहीं होता।
कई जगह परिवार के सदस्य ही दुकान और कारोबार संभालते हैं।
ऐसे में यदि मतदान की तारीख किसी दूसरे सामान्य दिन पर होती, तो क्या अधिक लोगों के लिए मतदान करना सुविधाजनक होता?
यह सवाल सरकार, प्रशासन और निर्वाचन व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।
क्या तारीख बदली जा सकती है?
यह भी समझना जरूरी है कि चुनाव की तारीख बदलना कोई साधारण प्रशासनिक फैसला नहीं है।
चुनाव कार्यक्रम के साथ सुरक्षा व्यवस्था, मतदानकर्मियों की तैनाती, मतदान केंद्र, मतपेटियां, परिवहन, प्रशिक्षण और मतगणना जैसी पूरी व्यवस्था जुड़ी होती है।
इसलिए तारीख बदलने की मांग के साथ इन व्यावहारिक पहलुओं पर भी विचार जरूरी है।
लेकिन अगर प्रशासनिक स्तर पर कोई वैकल्पिक तारीख संभव हो और उससे त्योहार तथा मतदान के बीच टकराव कम हो सकता हो, तो तारीख पर पुनर्विचार की मांग पर विचार किया जाना चाहिए।
क्योंकि चुनाव सिर्फ उम्मीदवारों का कार्यक्रम नहीं है।
चुनाव सबसे पहले मतदाता का अधिकार है।
अब सवाल सीधा है
अगर एक तारीख ऐसी है जिस दिन प्रदेश के लाखों लोग त्योहार की तैयारियों में व्यस्त हैं...
अगर उसी दिन व्यापारियों के लिए महत्वपूर्ण कारोबारी दिन है...
अगर महिलाओं पर घरेलू जिम्मेदारियां सामान्य दिनों की तुलना में ज्यादा हैं...
तो क्या चुनाव की तारीख पर एक बार फिर विचार किया जा सकता है?
क्या ऐसी तारीख चुनी जा सकती है, जब मतदाता के सामने त्योहार और मतदान के बीच समय का संकट न हो?
क्या प्रशासन यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि पंचायत चुनाव में अधिक से अधिक मतदाता सहजता से मतदान कर सकें?
क्योंकि मजबूत लोकतंत्र की पहचान सिर्फ चुनाव कराने से नहीं होती।
मजबूत लोकतंत्र की पहचान तब होती है जब हर योग्य मतदाता को मतदान करने का वास्तविक और सुविधाजनक अवसर मिले।
इसलिए सरकार और निर्वाचन प्राधिकरण के सामने यह एक विचारणीय सवाल है—
क्या पंचायत चुनाव के तीसरे चरण की तारीख पर पुनर्विचार किया जा सकता है?
यह मांग किसी पार्टी के लिए नहीं है।
यह मांग किसी उम्मीदवार के लिए नहीं है।
यह मांग सिर्फ मतदाता की सुविधा के लिए है।
त्योहार भी जरूरी हैं।
व्यापार भी जरूरी है।
परिवार भी जरूरी है।
और लोकतंत्र भी जरूरी है।
इसलिए अगर प्रशासनिक रूप से संभव हो, तो ऐसी तारीख का विकल्प तलाशना उचित होगा जिसमें त्योहार और मतदान एक-दूसरे के रास्ते में बाधा न बनें।
आखिर पंचायत चुनाव गांव के उस आम आदमी के लिए है, जो पांच साल में एक बार अपने प्रतिनिधि को चुनने के लिए मतदान केंद्र तक जाता है।
उसके लिए मतदान का रास्ता जितना आसान होगा, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।
अब देखना यह है कि इस सवाल पर सरकार और निर्वाचन व्यवस्था क्या रुख अपनाती है।
क्या धनतेरस के दिन पंचायत चुनाव की तारीख पर पुनर्विचार होगा?
यह सवाल अब सिर्फ तारीख का नहीं...
मतदाता की सुविधा और लोकतांत्रिक भागीदारी का सवाल बन चुका है।
