बीकानेर। चण्डीगढ संगीत नाटक अकादमी द्वारा चण्डीगढ के ख्यातनाम टैगोर थियेटर में दिनांक 6 जून को बीकानेर के प्रसिद्व हास्य व्यंग्य नाटक चार कोट का मंचन किया जायेगा। चण्डीगढ का प्रसिद्व टैगोर थियेटर भारत के सुंदर और भव्य ऑडिटोरियम में से एक है। संस्था महामंत्री कमल अनुरागी के बताया कि इस नाटक का निर्देषन सुधेष व्यास करेंगे और नाटक की प्रमुख भूमिकाओ में अषोक व्यास, दिनेष रंगा, नवलकिषोर व्यास, के के रंगा, उत्तम सिंह, राजषेखर शर्मा, विकास शर्मा, षिव सुथार, जितेन्द्र पुरोहित, सुमित मोहिल बल्लभ पुरोहित और सुरभि सोनी इत्यादि अभिनय करेंगे। चार कोट नाटक का इससे पूर्व में भी मुम्बई के अन्र्तराष्ट्रीय काला घोडा कला महोत्सव, मुम्बई युनिवर्सिटी के बसंत नाट्योत्सव, इलाहाबाद, जबलपुर, चण्डीगढ, कुरूक्षेत्र, के राष्ट्रीय नाटय समारोह में मंचन हो चुका हैं। राजस्थान में बीकानेर के अलावा जयपुर और जोधुपर में इसका मंचन किया जा चुका है।
चार कोट नाटक के मूल में आम आदमी का सरकारी व्यवस्था के प्रति एक दर्द है जिसे हास्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चार कोट जो जनता की सेवा अथवा सुरक्षा के प्रतीक है लेकिन वास्तव में आम आदमी उनसे सहमा हुआ है या उनसे बचने का प्रयास करता है। तंत्र की व्यवस्था में जकडा हुआ आम आदमी राजनीति में किस तरह यूज एण्ड थ्रो की तरह है, किस तरह उसकी भावना को एक सीढी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, किस तरह सेवा/सुरक्षा के कोट आज एक बिजनस सिंबल बन चुके है, ये सब विभिन्न नाटकीय घटनाओ और दृश्यबंधो के द्वारा नाटक में दर्शाया गया है। नाटक के मुूल में आम आदमी का सरकार, कानून एवं राजनीति में व्याप्त जटिल खामियो एवं विद्रूपता के प्रति एक दर्द है जिसे व्यंग्यात्मक एवं चुटीली भाषा के रूप में प्रस्तुत किया गया हैै।
चार कोट नाटक के मूल में आम आदमी का सरकारी व्यवस्था के प्रति एक दर्द है जिसे हास्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चार कोट जो जनता की सेवा अथवा सुरक्षा के प्रतीक है लेकिन वास्तव में आम आदमी उनसे सहमा हुआ है या उनसे बचने का प्रयास करता है। तंत्र की व्यवस्था में जकडा हुआ आम आदमी राजनीति में किस तरह यूज एण्ड थ्रो की तरह है, किस तरह उसकी भावना को एक सीढी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, किस तरह सेवा/सुरक्षा के कोट आज एक बिजनस सिंबल बन चुके है, ये सब विभिन्न नाटकीय घटनाओ और दृश्यबंधो के द्वारा नाटक में दर्शाया गया है। नाटक के मुूल में आम आदमी का सरकार, कानून एवं राजनीति में व्याप्त जटिल खामियो एवं विद्रूपता के प्रति एक दर्द है जिसे व्यंग्यात्मक एवं चुटीली भाषा के रूप में प्रस्तुत किया गया हैै।
