जयपुर । नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष बलदेव भाई शर्मा ने कहा कि गुलाम मानसिकता की शिक्षा पद्धति ने ज्ञान विज्ञान में भारत को पिछड़ा बताकर स्वबोध को नष्ट करने का प्रयास किया है। जबकि भारत का विज्ञान तर्क और तथ्यों से भी आगे जीवन जीने की चेतना देता है। वे शनिवार को पाथेय कण संस्थान की ओर से आयोजित च्प्राचीन भारत का विज्ञानज् विशेषांक के लोकार्पण समारोह में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि ऋषि मुनियों ने पौधों में चेतना होती है यह ज्ञान दुनियां के सामने रखा और इस ज्ञान को पीढी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया। अशिक्षा के बावजूद बुजुर्गों ने यह समझाया कि रात में पेड़ पत्तियों को छेड़ते नहीं है क्योंकि वे सो जाते है, इनमें चेतना होती है। यही बात आगे चलकर विज्ञान ने भी सिद्ध की, इसी खोज पर जगदीशचन्द्र बसु को नोबेल पुरस्कार मिला। उन्होंने कहा कि विज्ञान को धर्म और परंपराओं में ढ़ालकर इसे जीवन का अंग बना दिया, इसलिए हमारें देश में विज्ञान को जीवन विज्ञान कहा जाता है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद भी एक वर्ग ने सुनियोजित रूप से भारत की छवि को खराब करने का प्रयास किया। कई बुद्धिजीवी और पत्रकार अपने लेखों के जरिए यह बताने में पीछे नहीं रहे कि हमारें देश में कुछ भी आविष्कार नहीं हुआ और जो भी कुछ हमें दिखाई दे रहा है। वह अंग्रेजों की देन है। उन्होंने कहा कि इन लोगों ने देश में जो भ्रम फैलाया कुछ लोगों ने उसे स्वीकार भी कर लिया तथा विज्ञान के मामले में हम बहुत पीछे रहे, जबकि हकीकत इससे अलग है। हमारें मनीषियों ने विज्ञान को धर्म से जोड़ा क्योंकि धर्म के बिना विज्ञान विनाशक बन जाएगा। बलदेव भाई ने कहा कि हमारे शास्त्रों में जो कुछ लिखा है, वह कपोल कल्पनाएं नहीं है। हालांकि डाक्यूमेंटेशन सही तरीके नहीं हुआ। भारत को गुलाम बताया जाता है लेकिन भारत कभी पराजित नहीं हुआ। इसका संघर्ष का इतिहास रहा है। उन्होंने पराधीनता के काल में हमारे ज्ञान विज्ञान को हेय बनाकर प्रस्तुत किया और कई चीजें हमसें छुटती चली गई। उन्होंने प्राचीन भारत में विज्ञान विषय पर निकाले गए विशेषांक के लिए पाथेय कण संस्थान की प्रशंसा की। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता जाने माने वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र व्यास ने कहा कि ज्ञान विज्ञान की साधना अति प्राचीन काल से भारतीय विचार पद्धति में रही है। सर्व सामान्य लोकप्रिय ग्रन्थों में भी इसका विस्तार से वर्णन मिलता है। उन्होंने कहा कि भारत में इस्लामिक आक्रमणों के साथ साथ यहां के विद्वनों की दुर्गति होने लगी, शिक्षा केन्द्र नष्ट किए गए। पुस्तकालयों को जला दिया गया, इसके चलते प्राचीन साहित्य हमारें उपलब्ध नहीं है। कार्यक्रम में व्यास ने प्रजेंटेशन देकर प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में मौजूद विज्ञान के बारे में जानकारी दी और यह बताया कि प्राचीन काल से ही देश में विज्ञान मौजूद था और कई आविष्कार हुए हैं, लेकिन इनका श्रेय पाश्चात्य देशों को दिया जाता है। कार्यक्रम की शुरूआत में पाथेय कण के प्रधान संपादक कन्हैया लाल चतुर्वेदी ने प्राचीन भारत का विज्ञान विशेषांक के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि भारत ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में प्राचीन काल से ही विश्व गुरू रहा है। लेकिन आम लोग इस बारे में बहुत कम जानते है, उन्होंने बताया कि शून्य से नौ तक के दस अंकों के अलावा सामान्य और उच्च गणित की प्रत्येक शाखा का जन्म और विकास भारत में ही हुआ। हमारे देश के कुम्हार भी प्लास्टि सर्जरी में कुशल थे इसके प्रमाण अंग्रेजों के दस्तावेजों में हैं शल्य चिकित्सा की दृष्टि से भारत हजारों वर्षों से मार्गदर्शक राष्ट्र रहा है। इस विशेषांक में भारत में हुये वैज्ञानिक विकास की एक झलक दिखाने का प्रयास किया गया है।
कार्यक्रम को भू-वैज्ञानिक अशोक कावडिया, भारतीय महिला कबड्डी टीम की कप्तान ममता पुजारी ने भी सम्बोधित किया। इस अवसर पर जाने-माने कवि मदन मार्तण्ड,दिल्ली और अंतर्राष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी एवं भारतीय महिला कबड्डी टीम की कप्तान ममता पुजारी को सम्मानित भी किया गया।
