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मां हिंगलाज के लगा भक्तों का तांता।

स्टोरी -  (गौरव चतुर्वेदी)
आँखों  लिये मानी जाती है वरदानी,निराहार रहकर मांगते है मनोतिया।
देवली 
यहा उपखण्ड के चांदली ग्राम स्थित माताजी के नवरात्रों मे भक्तों का तांता लगा रहता है। नवरात्रों के अलावा भी मातारानी के मन्दिर में हमेशा भक्तों की भीड लगी रहती है । चांदली ग्राम स्थित माताजी हींगलाज के नाम से वियात जनश्रुति हैं ग्राम के बुजुर्गो के अनुसार मंा दुर्गा एक बडी पहाडी पर स्थित थी, किन्तु एक बुढिया सेविका की प्रार्थना पर हिंगलाज मॉ ग्राम के समीप सरोवर के निकट एक छोटी पहाडी पर पर्वत फ ोडकर विराजमान हुई, आज भी मंदिर में आने की कन्दरा मौजुद हैं। जिसमें मॉ के चढने वाली फू लपतियां डाली जाती है, जिसका अन्त भी नहीं हैं माताजी की प्रसिद्धी नेत्रदान से अधिक हैं । प्रतिवर्ष 2० - 25 यात्रियों को ऑखों में ज्योंति प्रदान करती हैं।
आंखों के लिये है वरदानी:-देवली उपखण्ड के चांदली ग्राम मे अरावली की पहाडी पर स्थित मां हिंगलाज की प्राचीन समय से ही मान्यता रही है की यहां पर नेत्र रोगियों को बहुत लाभ हो रहा है। ग्रामिणों के अनुसार यहा पर कई बार जन्म से अन्धे व्यक्तियों को भी नैत्र ज्योती मिली है और उनकी जिन्दगी दोबारा से रोशन हो गयी ।
नही होती है पशुबली:- देवली उपखण्ड के चांदली ग्राम स्थित मां हिंगलाज के आने वाले कई भक्तों का तर्क यह है कि यहां पर पशुबली होती है लेकिन इस तर्क को यहा के ग्राम वासी सिरे से नकारते है और कहते है कि यहा पर पशुबली बहुत समय से बंद है । मनोती पूर्ण होने पर रहते है निराहार:- चांदली माता के मन्दिर मे आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर माता के मन्दिर मे पूरे नवरात्र निराहार रहते है और अपनी सफ लता के लिये प्रार्थना करते है ।
होती है राज की पूजा:- नवरात्र की अष्टमी के दिन सबसे पहले राज की पूजा होती है जिसमें ग्राम के सरपंच,पंच पटेल एवं गणमान्य माता की पूजा अर्चना कर उनका श्रंगार करते है उसके बाद से मन्दिर को भक्तों के दर्शनों के लिये खोल दिया जाता है ।

विशेषता यह हैं कि नेत्र चिकित्सक द्वारा निर्वासित कर देने पर भी मॉ अंधों को ऑखे देती है पंगु, लंगडे, लूले तथा अन्य  बीमारियों से ग्रसित यात्रियों को भी यहां आराम मिलता हैं। माता के पूजक कुहार हैं। पशु बलि निरोधक समिती के अध्यक्ष रहे पं. दुर्गाशंकर चतुर्वेदी ने बताया कि दीर्घकाल से माताजी के सामने असंय बकरें तथा भैंसो का बलिदान होता रहा हैं। किन्तु क्षैत्र की जनता ने सन् 1958-59 में पशु बलि निरोधक समिति का गठन करके बलि का घोर विरोध किया। सफ लता तपोभूमि मथूरा के सन्तों  साधुओं द्वारा तथा प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका  से पशुबलि करना महापाप माना जा रहा हैं। फि र यहां शतचंडी यज्ञ स्व. श्री भंवरलाल जी पुत्र पं. प्रहलाद जी के सान्निध्य में सपन्न हुआ। जिसके बाद यहां निर्माण कार्याे का तांता सा लग गया, मीणा, गुर्जर, धाकड आदि  समाजों क ी अनेक धर्मशालाएं बनी हुई हैं, मॉ का मंदिर 2०० से 25० फु ट उंची पहाडी पर स्थित हैं, आवागमन के लिए दोनों और सीढियां बनी हुई हैं, जिन पर रेलिंग की सहायता से यात्री सुगमता से उतरते चढते रहते हैं। माताजी के यहॉ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा दशमी तक बांसती नवरात्रों में तथा आसोज सुदी प्रतिपदा से दशहरा तक शारदीय नवरात्रों में मेला लगता हैं दुर्गाष्टमी - नवमी को भारी संया में 5 ० हजार तक यात्री दर्शनों का लाभ प्राप्त करते हैं। निर्माण समिति का प्रतिवर्ष चुनाव होता हैं माता के यहां सिंहद्वार तथा मंदिर का पूर्णरूपेण सौन्दर्य करण किया जा रहा हैं। यात्रियों की सुविधा के लिए शुद्वपेयजल की व्यवस्था हैं। रात्रि प्रकाश के लिए बिजली का पूर्ण प्रबन्ध हैं। अष्टमी, गुरूवार, सोमवार, शुक्रवार को मॉ भगवती संतुष्टी के लिए पांती देती हैं। जिससे मनोकामना पूर्ण होती हैं। यहां बनी का कंकर घिस कर ऑखों पर लेप करने से नैत्र ज्योति ठीक हो जाती हैं। मनोति के रूप में पूरे वर्ष सवामणी गौठ प्रसादी के लिए आती रहती हैं दुकानों पर चढावा तथा चाय नाश्ता आदि मिलता हैं । आवागमन के लिए देवली से बसे टेक्सी आदि मिल जाती हैं।