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चन्दन सी महका दी लाड़ों की जिन्दगी - डॉ. दीपक आचार्य

तालीम का तराना सुना रहा मरुभूमि का बाशिन्दा
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और बेटी को सुनहरा भविष्य देने का संदेश आज परिवेश में गूंज रहा है लेकिन एक पिता ऎसे भी हैं जो पिछले कई सालों से बेटी को लक्ष्मी मानकर उसकी परवरिश करने में जुटे हैं। वे बेटी के लिए सिर्फ आदर्श पिता ही नहीं गुरु, मार्गदर्शक और मित्र होने के साथ-साथ सहपाठी के रूप में भी अपनी बेमिसाल पहचान बना चुके हैं।
मरुधरा की सरजमीं को गौरव देने वाले यह शख्स हैं जैसलमेर जिला मुख्यालय से 50 किलोमीटर दूर पारेवर गांव के रहने वाले चन्दनसिंह भाटी  पिता श्री मंगलसिंह। पन्द्रह जुलाई 1968 के दिन माता कवरो कँवर  की कोख से जन्मे चन्दनसिंह ने पारेवर और जैसलमेर के सरकारी स्कूल में पढ़ाई करते हुए वर्ष 1992 में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान से 10+2 परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद घरेलू परिस्थितियों के कारण पढ़ाई छोड़ कर सरकारी सेवा में आ गए व गृहस्थी बसा ली।
09 अक्टूबर सन् 1993 में उनके घर बिटिया का जन्म हुआ जिसे पुष्पा कँवर नाम मिला।  चन्दनसिंह भाटी व पूरे परिवार ने पुष्पा को लक्ष्मी का रूप मानकर पल्लवित किया, पढ़ाया।  सन् 2013 में पुष्पा कँवर ने 75 प्रतिशत अंकों के साथ सीनियर सैकण्डरी परीक्षा उत्तीर्ण कर कॉलेज पढ़ने की इच्छा जाहिर की।
बिटिया के मन मेंं उच्च शिक्षा पाने का ज़ज़्बा देख कर पिता चन्दनसिंह ने भी अपनी आगे की पढ़ाई शुरू करने की ठान ली। अब बेटी और पिता दोनों अपनी पारिवारिक भूमिकाओं के साथ शिक्षार्थी के रूप में सामने आए।
दोनों सहपाठी के रूप में साथ में पढ़ने लगे। आपस में सवाल-जवाब की संवाद शैली अपनाकर एक-दूसरे को विषयों का ज्ञान समझाते, चर्चा करते और जो समझ में नहीं आता उसके बारे में किसी गुरुजन से समाधान पाकर परस्पर ज्ञानार्जन करते रहे।
इससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी पैदा हुई और पढ़ाई के अनुकूल माहौल भी बना।  कुल 22 साल पहले छोड़ी गई पढ़ाई को 45 साल की उम्र में सिर्फ और सिर्फ अपनी बिटिया के लिए फिर से शुरू करना अपने आप में आश्चर्य से कम नहीं था।
बेटी के साथ जब चन्दनिंसंह भाटी बीए प्रथम वर्ष का फार्म भरने गए तो दोस्तों ने तो हौसला बढ़ाया मगर कुछ ने मजाक भी बनाई कि इस उमर में पढ़ाई का क्या फायदा। पर चन्दनसिंह बेटी का साथ निभाते हुए उच्च शिक्षा पाने के अपने संकल्प पर दृढ़ रहे। इसके बाद बाप-बेटी की यह संयुक्त शैक्षिक यात्रा कभी नहीं रुकी और लगातार तीन साल तक पढ़ाई करते हुए दोनों ही ने गत सत्र में बीए की डिग्री पा ली।
अपने संकल्प को साकार करने वाले चन्दनसिंह आज बेहद खुश हैं। वे कहते हैं कि पढ़ाई का माहौल बनाकर घर के सभी लोगों को पढ़ना चाहिए। इसका भी अपना अलग आनंद है और साझे में पढ़ाई से सफलता और अधिक आसान हो जाती है।
बेटियों की शिक्षा के प्रति लापरवाह रहने वाले माता-पिताओं को वे यह संदेश देना चाहते हैं कि बेटियों को भी पढ़ाएं और खुद भी पढ़ें, कुछ न कुछ नया सीखने की कोशिश करें। वे कहते हैं कि बेटी पढ़ लेगी तो कई परिवारों का कल्याण अपने आप होने लगेगा।
बकौल चन्दनसिंह भाटी - हर बेटी के भाग्य में पिता होता है लेकिन हर पिता के भाग्य में बेटी नहीं होती। बेटी लक्ष्मी है और यह भाग्यवान पिता को ही नसीब होती है।
चन्दनसिंह ने अपना जीवन बेटी पढ़ाओ अभियान के लिए समर्पित कर दिया है। इसके लिए जहां मौका मिलता है वे बेटियों को पढ़ाने के लिए अभिभावकों को प्रेरित करते रहे हैं।
उनका मानना है कि केन्द्र और राजस्थान सरकार की खूब योजनाएं हैं जिनका लाभ लेकर बालिका शिक्षा और उत्थान पर ध्यान दें। लेकिन इसके लिए यह जरूरी है कि माता-पिता खुद पढ़े-लिखें और घर-परिवार में पढ़ाई का अनुकूल वातावरण मिले।
राजस्थान के सीमान्त और पिछड़े माने जाने वाले जैसलमेर जिले के ग्रामीण क्षेत्र पारेवर से अपनी बेटी के लिए 48 वर्ष की उम्र में बीए की डिग्री पाने वाले चन्दसिंह  मिसाल हैं उन लोगों के लिए जो अपनी बेटियों को आगे पढ़ाने और भविष्य सँवारने के लिए चिन्तित रहा करते हैं।
पिता और बेटी का साथ-साथ चला यह तालीमी सफर मरु क्षेत्र भर में चर्चित रहा और उन्हें खूब सराहना मिली जिससे उन्हें अपने बेटी पढ़ाओ मिशन को खासा सम्बल प्राप्त हुआ।
चन्दनसिंह भाटी का कहना है कि उनका मकसद सिर्फ अपने परिवार तक ही सीमित नहीं है बल्कि वे चाहते हैं कि हर माता-पिता बेटा-बेटी का भेदभाव त्याग कर पढ़ाए और उच्च शिक्षा दिलाकर सुनहरी जिन्दगी से रूबरू कराए। जो बड़े-बुजुर्ग लोग अब तक नहीं पढ़ पाए हैं वे भी कदम आगे बढ़ाएं। कुछ नहीं तो साक्षर तो बन ही सकते हैं।
मरुभूमि में तालीम का तराना सुनाने वाले चन्दनसिंह भाटी का ग़ज़ब का ज़ज़्बा, त्याग और परिश्रम ‘‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’’ अभियान की भगीरथी का प्रवाह तीव्र करने मे अनुकरणीय पहल साबित हो रहा है।