अक्षय शब्द का अर्थ है "अविनाशी" या "शाश्वत", जो सफलता और सौभाग्य का प्रतीक है। यह त्योहार धन और समृद्धि से जुड़ा है। भक्त दान-पुण्य करके इस त्योहार को मनाते हैं|
वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया का पर्व बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस वर्ष यह पर्व 19 अप्रेल रविवार को मनाया जायेगा ।
एक युग का परिवर्तन
श्रमण संस्कृति में अक्षय तृतीया का पर्व मनाने की परंपरा का महत्व एकदम अलग है.| इसे श्रमण संस्कृति के साथ युग का प्रारंभ माना जाता है. जैन धर्म के अनुसार, भरत क्षेत्र में युग का परिवर्तन भोग भूमि व कर्मभूमि के रूप में हुआ था. भोग भूमि में कृषि व कर्मों की कोई आवश्यकता नहीं. उसमें कल्प वृक्ष होते हैं, जिनसे प्राणी को मनवांछित पदार्थों की प्राप्ति हो जाती है.तथा कर्म भूमि में कृषि व्यापार शिल्प आदि कर्मों का महत्व रहा है ।
जैन धर्म में अक्षय तृतीया दान पर्व
जैन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, जैन धर्म में अक्षय तृतीया पर दान का विशेष महत्व होता है.
इस दिन को 'अक्षय' (जो कभी नष्ट न हो) पुण्य प्रदान करने वाला माना जाता है। जैन श्रद्धालु इस दिन विशेष रूप से आहार दान, ज्ञान दान, और औषधि दान करते हैं, जिसे बहुत शुभ माना जाता है।
भगवान आदिनाथ ने सबसे पहले समाज में दान के महत्व को समझाया था और दान की शुरुआत की थी.। भगवान आदिनाथ राज-पाट् का त्याग करके वन में तपस्या करने निकल गए थे. उन्होंने वहां 6 महीने तक लगातार ध्यान किया था. 6 महीने बाद जब उन्होंने सोचा कि इस समाज को दान के बारे में समझाना चाहिए तो वे ध्यान से उठकर आहार मुद्रा धारण करके नगर की ओर निकल पड़े थे.। भगवान आदिनाथ ने इस दुनिया को असि-मसि-कृषि वाणिज्य व शिल्प के बारे में बताया था.तथा जीवन यापन के लिए इन्हें सीखने का उपदेश दिया था.।
अक्षय तृतीया पारण पर्व कैसे
जैन मत के अनुसार, भगवान ऋषभनाथ (प्रथम तीर्थंकर) ने करीब एक वर्ष की तपस्या ( 13 माह 9 दिवस ) करने के बाद वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि अर्थात अक्षय तृतीया के दिन इक्षु रस (गन्ने का रस) से अपनी तपस्या का पारण किया था.
हस्तिनापुर के राजा श्रेयांश ने गन्ने के रस का आहार देकर भगवान आदिनाथ को प्रथम आहार देने का सौभाग्य प्राप्त किया। इस कारण जैन समुदाय में यह दिन विशेष माना जाता है.।इसी मान्यता को लेकर आज भी अक्षय तृतीया का उपवास गन्ने के रस से तोड़ा जाता है. यहां इस उत्सव को “पारणI” के नाम से भी जाना जाता है।
अक्षय तृतीया स्वयं सिद्ध मुहूर्त
अक्षय तृतीया वैशाख माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है।अर्थात् ऐसा फल जिसका क्षय नहीं होता । इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।वैशाख माह की तृतीया तिथि ( जिसे “आखा तीज” भी कहते है ) स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है।
*जयपुर के जैन मंदिरों में यह पर्व आदिनाथ भगवान के अभिषेक , शांतिधारा , विधान तथा इक्षु रस वितरण कर तप , त्याग , दान आदि के साथ ; प्रवास रत साधु संतों के पावन सानिध्य में भक्ति भाव के साथ मनाया जाएगा।
पदम जैन बिलाला
जनकपुरी , जयपुर

