Exclusive-डिजिटल दुनिया से दूर फौजियों का गांव उसरिया की ढाणी

खबर - जयंत खांखरा 
70 घरों की बस्ती में 100 से अधिक है फौजी
मोबाइल टावर न होने से सरहद पर तैनात बेटों से भी नहीं हो सकती बात
पहाड़ी पर चढ़कर करनी पड़ती है फोन से बात
सड़क सुविधा से भी वंचित है गांव 
मोबाइल फोन व सड़क नहीं होने से गांव में रिश्ते होने हुए बंद
प्रधानमंत्री से गांव में मोबाइल चालू करवाने का कियानिवेदन
खेतङी -जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया की बात कर पूरे विश्व में भारत को एक अलग पहचान दिलाने में लगे हैं । और यदि राजस्थान के शेखावाटी की बात की जाए तो यहां के सेठ साहूकारों के साथ-साथ यहां के वीरों की वीर गाथा भी पूरे भारत मैं अलग पहचान कायम करती हैं ।झुंझुनू जिले के शहीद पीरू सिंह शेखावत का जिक्र प्रधानमंत्री ने अपने जयपुर दौरे में भी किया था। प्रधानमंत्री ने राजस्थान की कई योजनाओं का लोकार्पण भी डिजिटल तरीके से किया ।डिजिटल तरीके से हुई योजनाओं से लाभान्वित लाभार्थियों से रूबरू हुए लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है डिजिटल इंडिया के बड़े-बड़े दावे शेखावाटी के झुंझुनू जिले में स्थित खेतङी उपखंड के एक छोटे से गांव में फेल होते नजर आते हैं। खेतङी उपखंड का एक फौजियों का गांव जहां 70 घरों की बस्ती में 100 से अधिक फौजी है। इस गांव के जवानों ने विश्व युद्ध से लेकर भारत चीन व पाकिस्तान के साथ लड़ाई लड़ी । इस गांव की वीरता के चर्चे खूब होते हैं लेकिन यह गांव डिजिटल युग से काफी दूर है। यहां पर फोन पर बात करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। सरहद पर तैनात अपने लाडलों के लिए मां दुआ तो कर सकती है लेकिन फोन पर बात नहीं कर सकती। प्रधानमंत्री के डिजिटल की दुनिया बनाने व सैनिकों को सुविधा देने के दावे की पोल खोलती है।

 खेतङी मुख्यालय से 9 किलोमीटर दूर तथा स्टेट हाईवे नंबर 13 की सड़क से मात्र ढाई किलो मीटर दूर अरावली पहाड़ियों की तलहटी में बसे राजपूत जाति के गांव उसरिया की ढाणी । यह गांव तो 400 साल पहले बसा था इस गांव के युवाओं में देशभक्ति का जज्बा पहले से ही भरा हुआ है। द्वितीय विश्वयुद्ध में सूरजपाल सिंह ने लड़ाई लड़ी और उसी में शहीद भी हो गए। समुद्र सिंह व महिपाल सिंह ने 1965 व 1971 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई लड़ी। कारगिल की लड़ाई लड़ने वाले भी फौजी गांव में है लेकिन इस गांव को आज भी सुविधाओं के नाम पर दर्द झेलना पड़ रहा है। यहां पर किसी भी कंपनी का कोई भी मोबाइल टावर नहीं है इस गांव में बात करनी हो तो या तो पहाड़ी पर चढ़ कर बात करनी पड़ती है या फिर 9 किलोमीटर दूर खेतङी जाकर ही बात की जा सकती है। सरहद पर तैनात अपने लाडलों के लिए परिजन सिर्फ दुआएं ही कर सकते हैं लेकिन सलामती के लिए बात नहीं कर सकते। जब भी सीमा पर या फिर आतंकियों के साथ मुठभेड़ होने का समाचार सुनाई देता है तो यह गांव चिंता में डूब जाता है क्योंकि फोन पर भी बात नहीं हो सकती। दूसरा दर्द इस गांव में जाने के लिए पहाड़ी रास्तों से होते हुए सिर्फ कच्चा रास्ता ही है। अगर कोई रात को गांव जाने के लिए रिश्तेदार या कोई परिचित आए तो गांव में जाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। इस गांव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया बनाने के सपने की धज्जियां उड़ रही है। गांव की ही संतोष देवी ने प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र से ऑपरेशन करवाया इस बात की सूचना प्रधानमंत्री कार्यालय में पहुंची तो प्रधानमंत्री ने संतोष देवी से  वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सीधी बात करनी चाहि लेकिन फोन पर समय पर जानकारी नहीं मिलने पर बात नहीं हो सकी थी।

गांव के युवा है परेशान और हताश

इसी गांव के युवा हरिओम सिंह तथा अमित सिंह ने बताया कि सड़क और मोबाइल टावर नहीं होने की वजह से काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है आजकल हर नौकरी का फार्म या  कॉलेज के फॉर्म ऑनलाइन भरा जाते है और इसकी सूचना भी ऑनलाइन ही आती है हमारे पास स्मार्टफोन तो है फार्म भी भरते हैं लेकिन जब इसकी सूचना ऑनलाइन आती है तो समय पर नहीं मिल पाती है जिसके कारण बहुत विकट समस्या खड़ी हो गई है।

ग्रामीणों को राशन लेने  जाना पड़ता है कई किलोमीटर दूर

ग्रामीणों ने बताया कि इस गांव के ग्रामीणों को राशन लेने के लिए कई किलोमीटर दूर  जाना पड़ता है गांव में कोई राशन की दुकान नहीं है क्योंकि सब कुछ डिजिटल हो गया है बायोमेट्रिक मशीन पर अंगूठा लगाना पड़ता है ।कई बुजुर्ग महिलाएं हैं वह आने जाने में असमर्थ है । यदि गांव में मोबाइल टावर लग जाए तो आसपास की 15 छोटी मोटी ढाणियों को फायदा मिल सकता है

नौकरी होने के बावजूद भी गांव के बच्चों के नहीं होते रिश्ते

 खेतड़ी उपखंड के छोटे से गांव ऊसरिया की ढाणी कहीं हुआ  फौजी है  तथा अन्य  नौकरियों में भी कार्य करते हैं  लेकिन गांव की महिलाओं ने बताया की नौकरी में  होने के बावजूद मोबाइल का टावर व सड़क नहीं होने की वजह से कोई शादी विवाह का रिश्ता नहीं करना चाहता। इस समस्या के कारण कई परिवार तो शहरों की तरफ पलायन कर गए हैं।

इनका कहना है

सैनिक कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष प्रेम सिंह बाजोर

 इस मामले को लेकर सैनिक कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष प्रेम सिंह बाजोर के समक्ष लाया गया तो उन्होंने अपने विभाग का मामला नहीं होने का कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की। लेकिन जब याद दिलाया गया कि सैनिकों के कल्याण के लिए सरकार का दायित्व है तो उन्होंने उच्चधिकारियों को इस मामले में चर्चा करने का आश्वासन दिया।

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