बाड़मेर -जैसलमेर की राजनीति को क्या पलट देंगे मानवेन्द्र सिंह

खबर - प्रशांत गौड़ 
-राजपूत वोटबैंक आ सकता है कांग्रेस के पक्ष में, जाटवोट बैंक प्रभावित होने की आशंका
-भाजपा के संस्थापक नेता रहे जसवंत सिंह के पुत्र है मानवेन्द्र सिंह 
-सियासी फायदे नुकसान की गणित में जुटी पार्टियां 
जयपुर ।  बाड़मेर-जैसलमेर में की राजनीति में अब कांग्रेस में शामिल हुए मानवेन्द्र सिंह ने नई हलचल पैदा कर दी है। भाजपा से छिटककर कांग्रेस में गए मानवेन्द्र सिंह का बाड़मेर-जैसलमेर की राजनीति में व्यापक प्रभाव भी है। ऐसे में अब कांग्रेस में आने से वहां की राजीनीति में भाजपा की एंट्री कितनी मुश्किल होगी या लोग मानवेन्द्र सिंह को नाकार देंगे यह फैसला इस विधानसभा चुनाव में हो जाएगा।
चुनाव से पहले पाला बदलू पालिटिक्स यहां की राजनीति की पहचान बन चुकी है। अपनी सियासी मुनाफे-नुकसान को सोचकर नेता एक से दूसरे दल का दामन थामते आए। राजनीति में कद्दावा राजनेताओं में अपनी पहचान बना चुके भाजपा के संस्थापक सदस्य सदस्य और अटल बिहारी सरकार में मंत्री रहे जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह की अपनी उपेक्षा के बाद भाजपा को कई बार अपनी आम जनता में पकड़ को कई बार दर्शाया लेकिन भाजपा की ओर से शुभ संकेत सामने नहीं आने पर गत दिनों भाजपा से अलग हुए और अब कांग्रेस का दामन थाम लिया। कमल का फूल हमारी भूल की बात कहने वाले मानवेन्द्र सिंह अब कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा दे रहे है।
1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के रामनिवास मिर्धा ने जाट, मुस्लिम और दलितों का मजबूत गठजोड़ तैयार कर यहां से जीत हासिल की। इसके बाद कर्नल सोनाराम इस जातीय जुगलबंदी का फायदा उठाकर लगातार चुनाव 
भाजपा ने 1991 में कमल विजयए 1996 में जोगराज सिंहए 1998 में लोकेंद्र सिंह कालवी और 1999 में मानवेंद्र सिंह को मैदान में लेकिन भाजपा पराजित रही है लेकिन वर्ष 2004 में भाजपा सफल रही इस चुनाव में मानवेंद्र सिंह ने कर्नल सोनाराम को लाखों के मतों के अंतर से हराया। इसके बाद वर्ष 2013 में मानवेन्द्र बाडमेर की शिव सीट से विधायक बने। वही जब लोकसभा सीट से बाडमेर से जसवंत सिंह ने टिकट मांगा तो भाजपा ने उनकी बजाए कर्नज सोनाराम को टिकट दिया जिसके बाद जसवंत सिंह निर्दलीय चुनाव लड़े।लेकिन मोदी लहर की वजह से 80 हजार वोटों से चुनाव हार गए इसके बाद पिता के साथ देने के आरोप में मानवेंद्र सिंह को पार्टी से  निलंबित कर दिया। अब वह कांग्रेस में शामिल हुआ। 
जसवंत सिंह का राजस्थान सहित केन्द्र की राजनीति में व्यापक प्रभाव रहा। वह एक इमानदार और वरिष्ठ राजनेता के रुप में पहचान बनाई अब मानवेन्द्र सिंह को भी अपनी पिता की विरासत का भरपूर फायदा मिल रहा है। वहीं पश्चिमी राजस्थान में मानवेन्द्र की एंट्री में अब कांग्रेस होने पर इसका फायदा कांग्रेस को कई सीटों पर मिलेगा। मानवेन्द्र सिंह के कांग्रेस में आने से जहां राजपूत समाज भी उनके पूरी तरह साथ है हालांकि जाट समीकरण को मानवेन्द्र सिंह कैसे मैनेज करते है यह देखने वाली बात होगी हालांकि वर्ष 2014 में राजपूत समाज से आने वाले वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह को टिकट नहीं देकर कांग्रेस से आए कर्नल सोनाराम पर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने दावं टिकाया था। टिकट दिलाने में वसुंधरा राजे की जिद के आगे के्रन्द को भी उनके नाम पर मुहर लगानी पड़ी थी। अब भाजपा जाट वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए इस बात को भुना सकती है हालांकि हनुमान बेनवाली फैक्टर भी भाजपा के खिलाफ है। ऐसे में किसके पक्ष में कहां कितने वोट किस जाति के पड़ते है इससे भी तय होगा कि राजस्थान में अगली सरकार में मजबूती से किस पार्टी से किस जाति के विधायक ज्यादा जीतकर सामने आ रहे है हालांकि जहां जाट वोट नाराजगी का खतरा है वही मानवेन्द्र सिंह के साथ आने से भाजपा के परम्परागत वोटबैंक राजपूतो ंका कांग्रेस के साथ आने से इसका सीधा नुकसान बीजेपी को होगा। अब धोरों में मानवेंद्र सिंह का यह नया कदम उनको नई पहचान दिलाता या उनके लिए यह फैसला घाटे का सौदा साबित होता यह आने वाले समय बता देगा।

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