शहादत के18 वर्षो से नौकरी के लिए भटकते शहीद परिजन

खबर - पवन शर्मा 
अविवाहित शहीद के परिजनों को नौकरी मिलने का इंतजार
सूरजगढ़। देश की आन के लिए प्राणों की आहूतियां देने वाले वीर शहीदों की शहादत की के बाद परिजनों को मिलने वाली नौकरी के मामले में अपनाये गए सरकार के दोहरे मापदंडो से शहीद परिजनों को काफी दंश झेलना पड़ता है कुछ ऐसी ही पीड़ा के दर्द से मोई भारु गांव के शहीद राजेश कुमार के परिजनों को गुजरना पड़ रहा है। परिवार के होनहार पुत्र की शहादत के बाद 18 वर्ष बीत जाने के बाद भी परिजनो की आंखे सरकारी नौकरी की राह तकते तकते पथराने लगी है।  

18 वर्ष पूर्व हुए थे शहीद 
जानकारी के अनुसार मोई भारु गांव निवासी केशराम और गिन्नी देवी का लाडला अविवाहित पुत्र राजेश कुमार आर्मी की 286 मीडियम रेजिमेंट में तैनात था जो मात्र 23 वर्ष की  आयु में 6 जून 2000 को जेएंडके पीर पंजाल क्षेत्र में दुश्मनो के साथ लोहा लेते समय वीरगति  प्राप्त हो गया था। जिसके परिजनों को  सरकारी सुविधाये  व पैकेज तो मिले लेकिन किसी परिजन को सरकारी नौकरी नहीं मिली। सरकारी नौकरी के लिए शहीद के परिजन 18 वर्षो से दर दर की ठोकरे खाने को मजबूर है लेकिन उन्हें अभी तक नौकरी नहीं मिली। 

सांसद संतोष अहलावत से लगाई गुहार 
नौकरी के लिए वर्षो से दर द रकी ठोकरे खा रहे शहीद के भाई धर्मेंद्र सिंह ग्रामीणों के साथ  शनिवार को सूरजगढ़ कस्बे में झुंझुनू सांसद संतोष अहलावत के आवास पर पहुंचे और उन्हें अपनी पीड़ा बताई। इस दौरान सांसद संतोष अहलावत ने शहीद भाई को आश्वाशन देते हुए कहा की वे उनकी मांग को सरकार और सैनिक कल्याण बोर्ड तक पहुंचायेगी जिससे उन्हें नौकरी का परिलाभ मिल सके। 

नौकरी में लगाए गए प्रावधान आये आड़े 
शहादत के बाद नौकरी मिलने के मामले में सरकार द्वारा अपनाये जा रहे दोहरे सरकारी मापदंड शहीद परिजनों को अधिक दर्द दे रहे है। अभी कुछ समय पूर्व ही सरकार ने 1947 से 1970 तक के अविवाहित शहीद परिजनों में ब्लड रिलेशन में नौकरी लगाए जाने का प्रावधान तो रख दिया है लेकिन उसके बाद शहीद हुए व्यक्तियों के परिजनो को नौकरी मिलने दिक्क़ते सामने आई है ऐसे में सरकार को नियमो में एकरूपता लेकर शहादत को पूरा सम्मान देते हुए सभी शहीदों के परिजनों को एक सामान नौकरी देने

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